गायत्री दीक्षा लेकर कोई भी ब्रह्माण बन सकता है
ब्राह्मण जाति को हिन्दू धर्म में शीर्ष पर रखा गया है। लेकिन ब्राह्मणो के बारे में आज भी बहुत ही कम लोग जानते है, कि ब्राह्मण कितने प्रकार के होते है। स्मृति-पुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन है:- मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि। ब्राह्मण को धर्मज्ञ विप्र और द्विज भी कहा जाता है।

ब्राह्मण के कर्तव्य
छः कर्तव्य
सबसे पहले ब्राह्मण शब्द का प्रयोग अथर्वेद के उच्चारण कर्ता ऋषियों के लिए किया गया था। फिर प्रत्येक वेद को समझने के लिए ग्रन्थ लिखे गए उन्हें भी ब्रह्मण साहित्य कहा गया। ब्राह्मण का तब किसी जाति या समाज से नहीं था।
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वेद पड़ना पड़ना , यज्ञ करना करना , दान देना और लेना

ब्राह्मण वंशावली
ब्राह्मण कितने प्रकार
यूं तो प्रभु परशुराम ने प्रभु श्रीराम के पृथ्वी पर आगमन से पूर्व ही बार-बार यह पृथ्वी जीत कर ब्राह्मणों को शासन स्वरूप देना प्रारंभ कर दिया था। उस समय पृथ्वी पर रहने वाले समस्त उत्तर भारतीय ब्राह्मण संयुक्त रुप से गौड़ कहलाते थे। परंतु लंका विजय के बाद, इन ब्राह्मणों में वर्ग या समूह स्थापित होने प्रारंभ हो गए।
ब्राह्मणों की श्रेणियां
ब्राह्मणों में विभिन्न उपनाम..
ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों से जाना जाता है –> दीक्षित, शुक्ल, द्विवेदी त्रिवेदी, खाण्डल विप्र, ऋषीश्वर, वशिष्ठ, कौशिक, भार्गव , भारद्वाज, सनाढ्य ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, राय ब्राह्मण, त्यागी , बैरागी वैष्णव ब्राह्मण, बाजपेयी, श्रीखण्ड,भातखण्डे अनाविल, देशस्थ, कोंकणस्थ , दैवदन्या, देवरुखे और करहाड़े, निषाद अयंगर, हेगडे, नम्बूदरीपाद, अयंगर एवं अय्यर, नियोगी, राव, दास, मिश्र, शाकद्वीपीय (मग), जोशी, आदि।

ब्राह्मणों में कई जातियां है।इससे मूल कार्य व स्थान का पता चलता है
सम्यग व्यवहार सिद्धि के लिए प्रतिपादित की। अर्थात् जिस वंश में जो आदि पुरुष परम कीर्ति वाला प्रतापी, सिद्ध पुरुष, तपस्वी ऋषि, मनीषी, कुलप्रवर्त्तक आचार्य हुआ हो उसके नाम से ही गोत्र का नामकरण हो गया, जैसे- मनुष्यों को अपनी पहचान बताने के लिए अपने नाम के साथ पिता, पितामह प्रतितामह आदि का नाम बताकर पूर्ण परिचय देता है। इस कारण आदि काल से आज तक ब्राह्मण जाति के लोग अपने आपको वशिष्ठ, भारद्वाज, भार्गव , गौतम, अत्रि कश्यपादि की सन्तान बताकर गौरव का अनुभव करते हैं। यहाँ यह भी लिख देना उचित है कि प्रत्येक गोत्र के साथ प्रतिष्ठा के नाम होते थे। जो जिस ग्राम व स्थान में बसे व जिसकी जैसी योग्यता होती थी उसी प्रतिष्ठा से उसे पुकारा जाता था। जैसे- चतुर्वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाठक, शुक्ल, पांडे, दिक्षित, उपाध्याय, वाजपेयी एवं अग्निहोत्री आदि। इनमें वेद पढ़ने से द्विवेदी, त्रिवेदी आदि कहाये, अध्यापक होने से उपाध्याय पाठक और भट्टाचार्य कहाये। यज्ञादि कर्मानुष्ठान करने से वाजपेयी, अग्निहोत्री आरि दिक्षित कहाये श्रोत्रीय और स्मृति कर्मानुष्ठान करने से मिश्र. पुरोहित और शुद्ध निर्मल गुण-कर्मों के अनुष्ठान से शुक्ल कहाये।
ब्राह्मणों का इतिहास – स्थान , शासन, गोत्र , पदवी
आर्यावर्त्त के बीच पूर्वकाल में महाराजा जनमेजय एक बड़े चक्रवर्ती राजा का गुप्त दान भेद खुला कि जो जो ग्राम जिस जिस को मिला वह उसी में बसा और जिस ग्राम या नगर में बसा उसी पर उसका शासन हुआ, इन शासनों को कोई और अवटंक भी कहते हैं । बंगदेश से लेकर अमरनाथ पर्यन्त गौड़ देश की स्थिति है | यह श्रावस्तीपुरी गौड़ देश में इस समय मी सरयू नदी के उत्तर गोंडा नगर के समीप वर्तमान हैं, जिस देश की सीमा पूर्व में गंगा और गण्डकी का सम है, पश्चिम और दक्षिण दिशा में सरयू है, उत्तर में हिमालय है इसके मध्य की भूमि का नाम गौड़ देश है गण्डकी नदी की पश्चिमी भूमि गौड़ देश कहलाती है। सर्व प्रथम गोत्र का नाम अर्थात् जिस ऋषि की सन्तान हो उस ऋषि का नाम गोत्र हमारे गोत्र कहलाये जैसे- वशिष्ठ, भार्गव , भारद्वाज, गौतम, अत्रि कश्यपादि तथा शासन शासन को अवटंक या अल्ल भी कहते हैं जो शासन या अल्ल ब्राह्मणों के शादी विवाह मैं प्रयोग करते हैं जिससे किसी ऋषि की संतान का विवाह संयोग आपस में भाई बहन के रूप नहीं बने | पदवी जैसे- चतुर्वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाठक, शुक्ल, पांडे, दिक्षित, उपाध्याय, वाजपेयी एवं अग्निहोत्री आदि। Read more

छः शास्त्रों का बनना
“न्याय शास्त्र” गौतम ऋषि ने बताया. “वैशेषिकशास्त्र” कणाद मुनि ने रचा, “सांख्य शास्त्र” को कपिल आचार्य ने लिखा, “योग शास्त्र” का पातञ्जलि ने निर्माण किया, “मीमांसा शास्त्र” जैमिनी ने और “वेदान्त शास्त्र” को व्यास ने बनाया |
सूर्य सिद्धान्त
इसी प्रकार पृथ्वी और सूर्य चन्द्रमा तथा नक्षत्रों के घूमने और उदय अस्त पर वर्षों तक ध्यान दिया और यहाँ तक हद्द करदी कि दृथ्वी मुय चन्द्रमा की परिधियों को ठीक ठीक नाप लिया और उनके चक्रों का हिसाब समझ कर सूर्य चन्द्रमा के ग्रहण लगने का गुरु ऐसा सच्चा बना लिया था जो आज तक असत्य नहीं हुआ। इस समय के बने शास्त्र का नाम “सूर्य सिद्धान्त” हैं । जब ऋग्वेद और अथर्ववेद के मंत्रों पर विचार किया तब अग्नि विद्या और बिजली की विद्या को भी जान लिया था । फिर समुद्र पर दौड़ने वाली सवारी तार भृगर्भादि और आ काश में उड़ने वाले अनेक विमान भी बना लिये थे। जब क्षत्रियों का धनुविधा सिखाने की आवश्यकता हुई तब शीतल बाण, अग्निवाण, और लखसंघारीबाण बनाये गये थे। इस समय के ऋषि मनु स्वप्टा तथा विश्वकर्मा आदि हुये हैं।
ब्राह्मण एक ही जाति
सूर्य सिद्धान्त —-> इस समय में भी सब ब्राह्मण एक ही जाति के थे। अब यहाँ से बहुत काल पश्चात् ब्राह्मणों के दो भेद हो गये ओ विध्याचल के उत्तर और दक्षिण देश में गौड़ और द्राविड़ नाम से पुकारे जाने लगे अर्थात उत्तर देशवासी गौड़ ब्राह्मण और दक्षिण देश वासी द्राविड़ ब्राह्मण कहे जाते थे फिर एक एक भेद के पांच पांच भेद हुए अर्थात पञ्च गौड़ और पञ्च द्राविड़ ऐसे दश प्रकार के ब्राह्मण होगये | सारस्वत १ कान्य कुब्ज २ गौड़ ३ उत्कल ४ और मैथिल ५ ये पंच गौड़ कहलाते हैं और विध्याचल पर्वत के उत्तर में बसते हैं। कर्णाटक १ तैलङ्ग २ द्राविड़ ३ महाराष्ट्रियन ४ और गुर्जर ५ ये पंच द्राविड़ कहलाते हैं और विध्याचल के दक्षिण देश में बसते हैं | इस प्रकार पंचगौड़ और पंच द्राविड़ मिलकरदश ब्राह्मण कहलाते हैं।
Beliefs
पृथ्वी के “प्रथम शासक” आदि गौड़ या गौड़ ब्राह्मण।
आदि गौड़ (सृष्टि के प्रारंभ से गौड़ या आदि काल से गौड़ ) या गौड़ ब्राह्मण “पृथ्वी के प्रथम शासक ब्राह्मण” उत्तर भारतीय ब्राह्मणों की पांच गौड़ब्राह्मणों की मुख्य शाखा का प्रमुख भाग है, गौड़ ब्राह्मण, आदि गौड़ तथा श्री आदि गौड़ एक ही ब्राह्मण वंश हैl .. सभी तथ्य नीचे दिए लिंक पर ..
पंच गौड़ों में कहै जो सारस्वत, कान्य कुब्ज, उत्कल और मैथिल है ये भी गौड़ ही हैं, परन्तु मिन्न भिन्न देशों में बसने से इनके नाम बदल गये हैं, जैसे सरस्वती नदी के किनारे के देशों में बसने से “सारस्वत” कन्नौज के राज्य में बसने से “कान्यकुब्ज” उत्कल देश में बसने से “उत्कल” मिथिलापुर से बसने मे मैथिल नाम पड़ा. परन्तु जो गौड़ अयाचक धर्म का पालन करते हुए अपने प्राचीन गौड़ देश में ही निवास करते रहे वे अब तक भी आदि गौड़ कहलाते हैं।

ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्डया के अनुसार पृथ्वी के प्रथम ब्राह्मण (गौड़ ब्राह्मण) हैं जो छुआछूत के दोष को नहींमानते

मनुष्य मात्र के हाथ का भोजन ग्रहण करने में कोई बुराई नहीं मनाता क्योंकि प्रत्येक मनुष्य में इश्वर का वास् होता है गौड़ ब्राह्मणों का यह गुण,

अन्य का षड़यंत्र
दूसरों के द्वारा पृथ्वी के ‘आधुनिक ब्राह्मण’ कहा गया वेदों में भी छुआछूत को अपराध कहागया है

गौड़ वंश आदि काल से छुआछूत का विरोधी रहा है इसप्रकार आदि गौड़ वंश समाज में छुआछूत को एक धार्मिक षड़यंत्र कहता आया है
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ब्राह्मण, हिन्दू वर्ण व्यवस्था का एक वर्ण है। यास्क मुनि के निरुक्त के अनुसार, ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः अर्थात् ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है “ईश्वर का ज्ञाता”।
यद्यपि भारतीय जनसंख्या में ब्राह्मणों का दस प्रतिशत है तथापि धर्म, संस्कृति, कला तथा शिक्षा के क्षेत्र में देश कि आजादी और भारत राजनीति में महान योगदान रहता आया है। उत्तर प्रदेश=14%, बिहार=7%, उत्तराखंड=25%, हिमाचल प्रदेश=18%, मध्यप्रदेश=6% , राजस्थान=9.5%, हरियाणा=10%, पंजाब=7%, जम्मू कश्मीर=12%, झारखंड= 5%, दिल्ली=15% और देश कि लगभग=10% है ।
God Brahman Team
कार्यकारिणी सदस्य

संरक्षक
श्री सुखदेव शर्मा

अध्यक्ष
श्री हरस्वरूप शर्मा

उपाअध्यक्ष
श्री रामबाबू शर्मा

महामंत्री
श्री भवानी शंकर शर्मा
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- Japan’s benchmark bond yield hits 3% for first time since 1996 - Financial Times
- Ex-gang leader convicted of murder 30 years after Tupac Shakur’s death - The Washington Post
- Meteorite from 'once-in-a-lifetime' Great Salt Lake crash on display at University of Utah - KSL News
- Army secretary submits resignation to Trump after repeated clashes with Hegseth - washingtonpost.com
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- Hendersonville gas station, Asheville hotel identified as measles exposure sites - WLOS
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- Nepal rescuers blast hillside in search of hydropower workers as families wait anxiously - BBC
- Hundreds feared stuck in hydropower tunnels as flood deaths surpass 950 in Nepal and Tibet - AP News









