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महादेव पर क्यों नहीं चढ़ाया जाता है केतकी का फूल, जानिए वजह !

महादेव (Mahadev) को भोलेनाथ भी कहा जाता है क्योंकि वो अपने भक्त की भक्ति से बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं. अगर उनका भक्त रोजाना श्रद्धा के साथ उन्हें जल भी अर्पित करे, तो महादेव की असीम कृपा का पात्र बन जाता है. अपनी पूजा के दौरान महादेव धतूरा, आक, बेलपत्र आदि को भी प्रेम से स्वीकार कर लेते हैं. लेकिन जिस तरह अन्य देवी देवताओं की पूजा के कुछ नियम हैं, उसी तरह महादेव की पूजा (Mahadev Puja) से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं, जिनका हर भक्त को ध्यान रखना चाहिए. मान्यता है कि महादेव को सफेद रंग के पुष्प बेहद प्रिय हैं, लेकिन हर सफेद पुष्प महादेव को अर्पित नहीं किया जा सकता. केतकी का फूल भी सफेद होता है, लेकिन ये महादेव को कभी अर्पित नहीं करना चाहिए. मान्यता है कि महादेव ने स्वयं के​तकी के फूल (Ketki Flower) का त्याग कर दिया था. यहां जानिए इस पौराणिक कथा के बारे में.

ये है पौराणिक कथा

शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है? इसका फैसला स्वयं महादेव को करना था. तभी वहां एक विराट ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ. इस पर शिव जी ने कहा कि ब्रह्मा और विष्णु में से जो भी इस ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत बता देगा, वो ही श्रेष्ठ कहलाएगा.

ब्रह्माजी ने ज्योतिर्लिंग का आरंभ खोजने के लिए नीचे की ओर जाने का निर्णय लिया और विष्णु भगवान ज्योतिर्लिंग का अंत खोजने ऊपर की ओर चल पड़े. नीचे की ओर जाते समय ब्रह्माजी ने देखा कि एक केतकी फूल भी उनके साथ नीचे आ रहा है. ब्रह्माजी ने केतकी के फूल को खुद के पक्ष में झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया और महादेव के पास पहुंचकर कहा कि उन्होंने पता लगा लिया है कि ज्योतिर्लिंग कहां से उत्पन्न हुआ. उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया.

वहीं दूसरी तरफ विष्णु भगवान ने लौटकर महादेव से कहा कि वे इस शिवलिंग का अंत ढूंढ पाने में असमर्थ रहे हैं. ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से अपने पक्ष में झूठ बुलवाया. लेकिन महादेव तो अंतर्यामी हैं और वे सच जानते थे. इसलिए उन्हें इस झूठ पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने ब्रह्मा जी का एक सिर काट दिया और केतकी के पुष्प को झूठ बोलने के लिए दंडित करते हुए कहा कि आज के बाद इस पुष्प का इस्तेमाल कभी भी मेरी पूजा में नहीं किया जा सकेगा. मैं इस पुष्प को कभी स्वीकार नहीं करूंगा.

इसके बाद शिव जी ने कहा कि मैं ही आदि हूं और मैं ही अन्त हूं. मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूं. मुझ से ही आप दोनों की उत्पत्ति हुई है. ये ज्योतिर्लिंग भी मेरा ही स्वरूप है.इसके बाद ब्रह्मा जी को अपनी भूल का अहसास हुआ. इसके बाद ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु ने मिलकर ज्योतिर्लिंग की आराधना की. लेकिन तब से महादेव की पूजा में केतकी का फूल वर्जित हो गया.

 

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