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शादी - विवाह, नामकरण, गृह प्रवेश, काल सर्प दोष , मार्कण्डेय पूजा , गुरु चांडाल पूजा, पितृ दोष निवारण - पूजा , महाम्रत्युन्जय , गृह शांति , वास्तु दोष

AArati

श्री विष्णु आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी स्वामी शरण गहूं मैं किसकी तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम पूरण परमात्मा, 

तुम अंतर्यामी 

स्वामी तुम अंतर्यामी 

पारब्रह्म परमेश्वर, 

तुम सब के स्वामी ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम करुणा के सागर,
तुम पालन कर्ता
स्वामी तुम पालन कर्ता
मैं मूरख खल कामी ,
कृपा करो भर्ता ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति,
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

दीनबंधु दुखहर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी ठाकुर तुम मेरे
अपने हाथ उठा‌ओ,
द्वार पड़ा मैं तेरे ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

विषय विकार मिटा‌ओ,
पाप हरो देवा,
स्वामी पाप हरो देवा,
श्रद्धा भक्ति बढ़ा‌ओ,
संतन की सेवा ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

श्री जगदीश जी की आरती,
जो कोई नर गावे,
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी,
सुख संपत्ति पावे ||

|| ॐ जय जगदीश हरे ||

॥ इति श्री विष्णु आरती॥

“ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट क्षण में दूर करे ॐ जय जगदीश हरे”

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भगवान श्रीगणेश जी की आरती
Table of Contents
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ जय…॥

एकदंत, दयावंत, चारभुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी ॥ जय…॥

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥ जय…॥

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लडुअन का भोग लगे, संत करे सेवा ॥ जय…॥

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी ॥ जय…॥

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श्री शालिग्राम जी की आरती
शालिग्राम सुनो विनती मेरी ।

यह बरदान दयाकर पाऊं ।।

प्रात: समय उठी मंजन करके ।
प्रेम सहित सनान कराऊँ ।।

चन्दन धुप दीप तुलसीदल ।
वरन -बरन के पुष्प चढ़ाऊँ ।।

तुम्हरे सामने नृत्य करूँ नित ।
प्रभु घंटा शंख मृदंग बजाऊं ।।

चरण धोय चरणामृत लेकर ।
कुटुंब सहित बैकुण्ठ सिधारूं ।।

जो कुछ रुखा सूखा घर में ।
भोग लगाकर भोजन पाऊं ।।

मन वचन कर्म से पाप किये ।
जो परिक्रमा के साथ बहाऊँ ।।

ऐसी कृपा करो मुझ पर ।
जम के द्वार जाने न पाऊं ।।

माधोदास की बिनती एहि है ।
हरी दासन का दास कहाऊं ।।

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शिव की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा
ॐ जय शिव ओंकारा

ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा
ॐ जय शिव ओंकारा

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे
स्वामी पञ्चानन राजे
हंसासन गरूड़ासन
हंसासन गरूड़ासन
वृषवाहन साजे
ॐ जय शिव ओंकारा

दो भुज चार चतुर्भुज, दसभुज ते सोहे
स्वामी दसभुज ते सोहे
तीनों रूप निरखता
तीनों रूप निरखता
त्रिभुवन मन मोहे
ॐ जय शिव ओंकारा

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी
स्वामी मुण्डमाला धारी
चन्दन मृगमद चंदा
चन्दन मृगमद चंदा
भोले शुभ कारी
ॐ जय शिव ओंकारा

श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे
स्वामी बाघाम्बर अंगे
ब्रह्मादिक संतादिक
ब्रह्मादिक संतादिक
भूतादिक संगे
ॐ जय शिव ओंकारा

कर मध्ये च’कमण्ड चक्र त्रिशूलधरता
स्वामी चक्र त्रिशूलधरता

जग कर्ता जग हरता
जग कर्ता जग हरता
जगपालन करता
ॐ जय शिव ओंकारा

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका
स्वामी जानत अविवेका
प्रनाबाच्क्षर के मध्ये
प्रनाबाच्क्षर के मध्ये
ये तीनों एका
ॐ जय शिव ओंकारा

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ जन गावे
स्वामी जो कोइ जन गावे
कहत शिवानन्द स्वामी
कहत शिवानन्द स्वामी
मनवान्छित फल पावे
ॐ जय शिव ओंकारा

ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा
ॐ जय शिव ओंकारा

ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा
ॐ जय शिव ओंकारा

भारत माता की आरती
आरती भारत माता की,
जगत के भाग्य विधाता की ।
आरती भारत माता की,
ज़गत के भाग्य विधाता की ।
सिर पर हिम गिरिवर सोहै,
चरण को रत्नाकर धोए,
देवता गोदी में सोए,
रहे आनंद, हुए न द्वन्द,
समर्पित छंद,
बोलो जय बुद्धिप्रदाता की,
जगत के भाग्य विधाता की

आरती भारत माता की,
जगत के भाग्यविधाता की ।

जगत में लगती है न्यारी,
बनी है इसकी छवि न्यारी,
कि दुनियाँ देख जले सारी,
देखकर झलक,
झुकी है पलक, बढ़ी है ललक,
कृपा बरसे जहाँ दाता की,
जगत के भाग्य विधाता की

आरती भारत माता की,
जगत के भाग्यविधाता की ।

गोद गंगा जमुना लहरे,
भगवा फहर फहर फहरे,
लगे हैं घाव बहुत गहरे,
हुए हैं खण्ड, करेंगे अखण्ड,
देकर दंड मौत परदेशी दाता की,
जगत के भाग्य विधाता की

आरती भारत माता की,
जगत के भाग्यविधाता की ।

पले जहाँ रघुकुल भूषण राम,
बजाये बँसी जहाँ घनश्याम,
जहाँ का कण कण तीरथ धाम,
बड़े हर धर्म, साथ शुभ कर्म,
लढे बेशर्म बनी श्री राम दाता की,
जगत के भाग्य विधाता की

आरती भारत माता की,
जगत के भाग्यविधाता की ।

बड़े हिन्दू का स्वाभिमान ,
किया केशव ने जीवनदान,
बढाया माधव ने भी मान,
चलेंगे साथ,
हाथ में हाथ, उठाकर माथ,
शपथ गीता गौमाता की,
जगत के भाग्य विधाता की
आरती भारत माता की,
जगत के भाग्यविधाता की ।

बालाजी हनुमान जी की आरती
ॐ जय हनुमत वीरा,
स्वामी जय हनुमत वीरा ।
संकट मोचन स्वामी,
तुम हो रनधीरा ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

पवन पुत्र अंजनी सूत,
महिमा अति भारी ।
दुःख दरिद्र मिटाओ,
संकट सब हारी ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

बाल समय में तुमने,
रवि को भक्ष लियो ।
देवन स्तुति किन्ही,
तुरतहिं छोड़ दियो ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

कपि सुग्रीव राम संग,
मैत्री करवाई।
अभिमानी बलि मेटयो,
कीर्ति रही छाई ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

जारि लंक सिय-सुधि ले आए,
वानर हर्षाये ।
कारज कठिन सुधारे,
रघुबर मन भाये ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

शक्ति लगी लक्ष्मण को,
भारी सोच भयो ।
लाय संजीवन बूटी,
दुःख सब दूर कियो ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

रामहि ले अहिरावण,
जब पाताल गयो ।
ताहि मारी प्रभु लाय,
जय जयकार भयो ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

राजत मेहंदीपुर में,
दर्शन सुखकारी ।
मंगल और शनिश्चर,
मेला है जारी ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

श्री बालाजी की आरती,
जो कोई नर गावे ।
कहत इन्द्र हर्षित,
मनवांछित फल पावे ॥
॥ ॐ जय हनुमत वीरा..॥

माता जगदम्बा जी की आरती
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ।
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

पान सुपारी धव्जा नरिरल ले तेरी भेंट चढ़ाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

सुआ चोली तेरे अंग बिराजे, केसर तिलक लगाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे,शंकर तिलक लगाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

नंगे नंगे पग से तेरे सम्मुख से अकबर आया
सोने का छत्र चढ़ाया…
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

सतयुग द्वापर त्रेता मद्धया कलयुग राज सवाया ।।
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

धुप, दीप, नैवैध आरती मोहन भोग लगाया ।।
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

धयानू भक्त मैया तेरा गुण गाये मनबांछित्त फल पाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

श्री बटुक भैरव जी की आरती
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा ।
जय काली और गौरा देवी कृत सेवा ।।
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा …….

तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिंधु तारक ।
भक्तों के सुख कारक विषन बपुधारक ।।
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा …….

वाहन शवान विराजत कर त्रिशूल धारी
महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी ।।
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा …….

तेल बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे ।
चौमुख दीपक दर्शन दुःख होवे ।।
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा …….

तुम चटकी दधि मिश्रित मशबली तेरी ।
कृपा करिए भैरव करिए नहीं देरी ।।
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा …….

पाव घुंघरू बाजत डमरु डमकावत ।
बटुकनाथ वन बालक जन मन हर्षावत ।।
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा …….

बटुकनाथ की आरती जो कोई नर गावे ।
कहे धारणधीर नर मनोवांछित फल पावे ।।
जय भैरव देवा ,प्रभु जय भैरव देवा …….

श्री रामचंद्र जी की आरती
आरती कीजै रामचंद्र जी की ।
हरि हरि दुष्ट दलन सीतापति जी की ।।

पहली आरती पुष्पन की माला ।
काली नागनाथ लाए गोपाला ।।

दूसरी आरती देवकी नंदन ।
भक्त उभारण कंस निकंदन ।।

तीसरी आरती त्रिभुवन मन मोहे ।
रतन सिंहासन सीताराम जी सोहे ।।

चौथी आरती चहुं युग पूजा ।
देव निरंजन स्वामी और न दूजा ।।

पांचवी आरती राम को भावे ।
राम जी का यश नामदेव जी गावे।।

श्रीमद्भागवतमहापुराण आरती
आरती अतिपावन पुराण की ।
धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥

महापुराण भागवत निर्मल ।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ॥

परमानन्द सुधा-रसमय कल ।
लीला-रति-रस रसनिधान की ॥

॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥

कलिमथ-मथनि त्रिताप-निवारिणि ।
जन्म-मृत्यु भव-भयहारिणी ॥

सेवत सतत सकल सुखकारिणि ।
सुमहौषधि हरि-चरित गान की ॥

॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥

विषय-विलास-विमोह विनाशिनि ।
विमल-विराग-विवेक विकासिनि ॥

भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि ।
परम ज्योति परमात्मज्ञान की ॥

॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥

परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि ।
रसिक-हृदय-रस-रासविलासिनि ॥

भुक्ति-मुक्ति-रति-प्रेम सुदासिनि ।
कथा अकिंचन प्रिय सुजान की ॥

॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥

॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराण की आरती ॥

गौ माता की आरती
आरती श्री गैय्या मैंय्या की,
आरती हरनि विश्वब धैय्या की,

अर्थकाम सुद्धर्म प्रदायिनि
अविचल अमल मुक्तिपददायिनि,

सुर मानव सौभाग्यविधायिनि,
प्यारी पूज्य नंद छैय्या,

अख़िल विश्वौ प्रतिपालिनी माता,
मधुर अमिय दुग्धान्न प्रदाता,

रोग शोक संकट परित्राता
भवसागर हित दृढ़ नैय्या की,

आयु ओज आरोग्यविकाशिनि,
दुख दैन्य दारिद्रय विनाशिनि,

सुष्मा सौख्य समृद्धि प्रकाशिनि,
विमल विवेक बुद्धि दैय्या की,

सेवक जो चाहे दुखदाई,
सम पय सुधा पियावति माई,

शत्रु मित्र सबको सुखदायी,
स्नेह स्वभाव विश्व जैय्या की,

॥ इति आरती श्री गौमता जी की ॥

संतोषी माता आरती
जय संतोषी माता,
मैया जय संतोषी माता ।

अपने सेवक जन को,
सुख संपति दाता ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

सुंदर चीर सुनहरी,
मां धारण कीन्हों ।

हीरा पन्ना दमके,
तन श्रृंगार लीन्हों ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

गेरू लाल छटा छवि,
बदन कमल सोहे ।

मंदर हंसत करूणामयी,
त्रिभुवन मन मोहे ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

स्वर्ण सिंहासन बैठी,
चंवर ढुरे प्यारे ।

धूप, दीप,नैवैद्य,मधुमेवा,
भोग धरें न्यारे ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

गुड़ अरु चना परमप्रिय,
तामें संतोष कियो।

संतोषी कहलाई,
भक्तन वैभव दियो ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

शुक्रवार प्रिय मानत,
आज दिवस सोही ।

भक्त मण्डली छाई,
कथा सुनत मोही ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

मंदिर जगमग ज्योति,
मंगल ध्वनि छाई ।

विनय करें हम बालक,
चरनन सिर नाई ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

भक्ति भावमय पूजा,
अंगीकृत कीजै ।

जो मन बसे हमारे,
इच्छा फल दीजै ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

दुखी,दरिद्री ,रोगी ,
संकटमुक्त किए ।

बहु धनधान्य भरे घर,
सुख सौभाग्य दिए ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

ध्यान धर्यो जिस जन ने,
मनवांछित फल पायो ।

पूजा कथा श्रवण कर,
घर आनंद आयो ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

शरण गहे की लज्जा,
राखियो जगदंबे ।

संकट तू ही निवारे,
दयामयी अंबे ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

संतोषी मां की आरती,
जो कोई नर गावे ।

ॠद्धिसिद्धि सुख संपत्ति,
जी भरकर पावे ॥

॥ ॐ जय संतोषी माता ॥

॥ इति श्री संतोषी माता आरती ॥

तुलसी माता की आरती
जय जय तुलसी माता,
सब जग की सुखदाता ।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

सब योगों के ऊपर,
सब लोगों के ऊपर,

रुज से रक्षा करके भव त्राता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

बटु पुत्री है श्यामा,
सूर बल्ली है ग्राम्या,

विष्णु प्रिये जो तुमको सेवे,
सो नर तर जाता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

हरि के शीश विराजत
त्रिभुवन से हो वंदित,

पतित जनों की तारिणि,
तुम हो विख्याता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

लेकर जन्म विजन में आई
दिव्य भवन में,

मानव लोक तुम्हीं से
सुख संपत्ति पाता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

हरि को तुम अति प्यारी
श्याम वर्ण सुकुमारी,

प्रेम अजब है उनका
तुम से कैसा नाता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

॥ इति श्री तुलसी आरती ॥

श्री महाकाली आरती

मंगल की सेवा सुन मेरी देवा ,
हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े।

पान सुपारी ध्वजा नारियल
ले ज्वाला तेरी भेंट करें।

सुन जगदम्बे कर न विलम्बे,
संतन के भडांर भरे।

सन्तान प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जै काली कल्याण करे ।

बुद्धि विधाता तू जग माता ,
मेरा कारज सिद्ध करे।

चरण कमल का लिया आसरा,
शरण तुम्हारी आन पड़े।

जब जब भीर पड़ी भक्तन पर,
तब तब आय सहाय करे।

बार बार तै सब जग मोहयो,
तरूणी रूप अनूप धरे।

माता होकर पुत्र खिलावे,
कही भार्या भोग करे॥

संतन सुखदायी,सदा सहाई ,
संत खड़े जयकार करे ।

ब्रह्मा ,विष्णु,महेश फल लिए
भेंट देन सब द्वार खड़े|

अटल सिहांसन बैठी माता,
सिर सोने का छत्र धरे ॥

वार शनिचर कुंकुमवरणी,
जब लुकुण्ड पर हुक्म करे ।

खड्ग खप्पर त्रिशुल हाथ लिये,
रक्त बीज को भस्म करे।

शुम्भ निशुम्भ क्षणहि में मारे ,
महिषासुर को पकड़ धरे ॥

आदित वारी आदि भवानी ,
जन अपने को कष्ट हरे ।

कुपित होकर दानव मारे,
चण्ड मुण्ड सब चूर करे ॥

जब तुम देखी दया रूप हो,
पल मे सकंट दूर टरे।

सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता ,
जन की अर्ज कबूल करे ॥

सात बार की महिमा बरनी,
सब गुण कौन बखान करे।

सिंह पीठ पर चढी भवानी,
अटल भवन मे राज्य करे ॥

दर्शन पावे मंगल गावे ,
सिद्ध साधक तेरी भेट धरे ।

ब्रह्मा वेद पढे तेरे द्वारे,
शिव शंकर हरी ध्यान धरे ॥

इन्द्र कृष्ण तेरी करे आरती,
चॅवर कुबेर डुलाय रहे।

जय जननी जय मातु भवानी ,
अटल भवन मे राज्य करे ॥

सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
मैया जै काली कल्याण करे।

॥ इति श्री महाकाली आरती ॥

श्री दुर्गा आरती
ॐ जय अम्बे गौरी ,
मैया जय श्यामा गौरी ।

तुमको निशदिन ध्यावत
हरी ब्रह्मा शिवजी ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

मांग सिन्दूर विराजत
टीको मृगमद को ।

उज्जवल से दोउ नैना
चन्द्रवदन नीको ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

कनक समान कलेवर
रक्ताम्बर राजे ।

रक्तपुष्प गल माला
कण्ठन पर साजे ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

केहरि वाहन राजत
खड्ग खप्पर धारी ।

सुर नर मुनि जन सेवत
तिनके दुःख हारी ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

कानन कुण्डल शोभित
नासाग्रे मोती ।

कोटिक चन्द्र दिवाकर
सम राजत ज्योति ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

शुम्भ निशुम्भ विदारे
महिषासुर घाती ।

धूम्र विलोचन नैना
निशदिन मदमाती ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

चंड मुंड संहारे
शोणित बीज हरे ।

मधु कैटभ दोउ मारे
सुर भयहीन करे ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

ब्रह्माणी रुद्राणी
तुम कमला रानी ।

आगम निगम बखानी
तुम शिव पटरानी ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

चौसठ योगिनी गावत
नृत्य करत भैरों ।

बाजत ताल मृदंगा
अरु बाजत डमरू ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

तुम ही जग की माता
तुम ही हो भरता ।

भक्तन की दुःख हरता
सुख सम्पति करता ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

भुजा चार अति शोभित
वर मुद्रा धारी ।

मनवांछित फल पावत
सेवत नर नारी ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

कंचन थाल विराजत
अगर कपूर बाती ।

श्रीमालकेतु में राजत
कोटि रतन ज्योति ॥

॥ ॐ जय अम्बे गौरी ॥

श्री अम्बे जी की आरती
जो कोई नर गावे ।

कहत शिवानंद स्वामी
मनवांछित पावे ॥

॥ इति श्री दुर्गा आरती ॥

श्री महालक्ष्मी आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता।

तुमको निशदिन सेवत,
हरि विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

उमा,रमा,ब्रह्माणी,
तुम ही जग-माता।

सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत,
नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

दुर्गा रुप निरंजनी,
सुख सम्पत्ति दाता।

जो कोई तुमको ध्यावत,
ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

तुम पाताल-निवासिनि,
तुम ही शुभदाता।

कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी,
भवनिधि की त्राता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

जिस घर में तुम रहतीं,
तहँ सब सद्गुण आता।

सब सम्भव हो जाता,
मन नहीं घबराता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

तुम बिन यज्ञ न होते,
वस्त्र न कोई पाता।

खान-पान का वैभव,
सब तुमसे आता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर,
क्षीरोदधि-जाता।

रत्न चतुर्दश तुम बिन,
कोई नहीं पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

महालक्ष्मीजी की आरती,
जो कोई जन गाता।

उर आनन्द समाता,
पाप उतर जाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

॥ इति श्री महालक्ष्मी आरती ॥

श्री खाटू श्याम आरती
ॐ जय श्री श्याम हरे,

प्रभु जय श्री श्याम हरे।

निज भक्तन के तुमने
पूरन काम करे।

॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥

गल पुष्प की माला,
सिर पर मुकुट धरे
पीत बसन पीताम्बर,
कुण्डल कर्ण पड़े

॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥

रत्न सिंहासन राजत,
सेवक भक्त खड़े
खेवत धूप अग्नि पर,
दीपक ज्योति जड़े

॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥

मोदा खीर चूरमा ,
सुवर्ण थाल भरे
सेवक भोग लगावत
सिर पर चंवर ढुरे

॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥

झांझ नगाड़ा और घड़ि़यावल,
शंख मृदंग धुरे।

भक्त आरती गावे,
जय-जयकार करे॥

॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥

जो ध्यावे फल पावे,
सब दुःख से उबरे।

सेवक जन निज मुख से,
श्री श्याम-श्याम उचरे॥

॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥

‘श्री श्याम बिहारीजी’ की आरती,
जो कोई नर गावे।

कहत ‘दासकमल’ स्वामी,
मनवांछित फल पावे॥

॥ इति श्री खाटू श्याम आरती ॥

श्री नवग्रह आरती

आरती श्री नवग्रहों की कीजै,

कष्ट,रोग,हर लीजै ।

सूर्य तेज़ व्यापे जीवन भर
जाकी कृपा कबहु नहिं छीजै।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

रुप चंद्र शीतलता लायें
शांति स्नेह सरस रसु भीजै।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

मंगल हरे अमंगल सारा
सौम्य सुधा रस अमृत पीजै ।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

बुद्ध सदा वैभव यश लीये.
सुख सम्पति लक्ष्मी पसीजै।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

विद्या बुद्धि ज्ञान गुरु से ले लो
प्रगति सदा मानव पै रीझे।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

शुक्र तर्क विज्ञान बढावै
देश धर्म सेवा यश लीजे ।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

न्यायधीश शनि अति ज्यारे
जप तप श्रद्धा शनि को दीजै ।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

राहु मन का भरम हरावे
साथ न कबहु कुकर्म न दीजै ।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

स्वास्थ्य उत्तम केतु राखै
पराधीनता मनहित खीजै ।

॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥

॥ इति श्री नवग्रह आरती ॥

श्री कुबेर आरती
ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे ,
स्वामी जै यक्ष जै यक्ष कुबेर हरे।

शरण पड़े भगतों के,
भण्डार कुबेर भरे।

॥ ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे…॥

शिव भक्तों में भक्त कुबेर बड़े,
स्वामी भक्त कुबेर बड़े।

दैत्य दानव मानव से,
कई-कई युद्ध लड़े ॥

॥ ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे…॥

स्वर्ण सिंहासन बैठे,
सिर पर छत्र फिरे,
स्वामी सिर पर छत्र फिरे।

योगिनी मंगल गावैं,
सब जय जय कार करैं॥

॥ ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे…॥

गदा त्रिशूल हाथ में,
शस्त्र बहुत धरे,
स्वामी शस्त्र बहुत धरे।

दुख भय संकट मोचन,
धनुष टंकार करें॥

॥ ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे…॥

भांति भांति के व्यंजन बहुत बने,
स्वामी व्यंजन बहुत बने।

मोहन भोग लगावैं,
साथ में उड़द चने॥

॥ ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे…॥

बल बुद्धि विद्या दाता,
हम तेरी शरण पड़े,
स्वामी हम तेरी शरण पड़े

अपने भक्त जनों के ,
सारे काम संवारे॥

॥ ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे…॥

मुकुट मणी की शोभा,
मोतियन हार गले,
स्वामी मोतियन हार गले।

अगर कपूर की बाती,
घी की जोत जले॥

॥ ऊँ जै यक्ष कुबेर हरे…॥

यक्ष कुबेर जी की आरती ,
जो कोई नर गावे,
स्वामी जो कोई नर गावे ।

कहत प्रेमपाल स्वामी,
मनवांछित फल पावे।

॥ इति श्री कुबेर आरती ॥

श्री राम आरती
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन,
हरण भवभय दारुणम्।

नव कंज लोचन, कंज मुख
कर कंज पद कंजारुणम्॥

॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि,
नव नील नीरद सुन्दरम्।

पट पीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचि
नौमि जनक सुतावरम्॥

॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥

भजु दीनबंधु दिनेश दानव
दैत्य वंश निकन्दनम्।

रघुनन्द आनन्द कन्द कौशल
चन्द्र दशरथ नन्द्नम्॥

॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू
उदारु अंग विभूषणम्।

आजानुभुज शर चाप-धर,
संग्राम जित खरदूषणम्॥

॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥

इति वदति तुलसीदास,
शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।

मम ह्रदय कंज निवास कुरु,
कामादि खल दल गंजनम्॥

॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥

मन जाहि राचेऊ मिलहि सो वर
सहज सुन्दर सांवरो।

करुणा निधान सुजान शील
सनेह जानत रावरो॥

॥श्री रामचन्द्र कृपालु..॥

॥ इति श्री राम आरती॥

लक्ष्मी जी की आरती ॐ जय लक्ष्मी माता

ॐ जय लक्ष्मी माता, तुमको निस दिन सेवत,
मैया जी को निस दिन सेवत
हर विष्णु विधाता || ॐ जय ||

उमा रमा ब्रम्हाणी, तुम ही जग माता
ओ मैया तुम ही जग माता
सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता || ॐ जय ||

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पति दाता
ओ मैया सुख सम्पति दाता
जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता || ॐ जय ||

तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभ दाता
ओ मैया तुम ही शुभ दाता
कर्म प्रभाव प्रकाशिनी, भव निधि की दाता || ॐ जय ||

जिस घर तुम रहती तहँ सब सदगुण आता
ओ मैया सब सदगुण आता
सब सम्ब्नव हो जाता, मन नहीं घबराता || ॐ जय ||

तुम बिन यज्ञ न होता, वस्त्र न कोई पाता
ओ मैया वस्त्र ना पाटा
खान पान का वैभव, सब तुम से आता || ॐ जय ||

शुभ गुण मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता
ओ मैया क्षीरोदधि जाता
रत्ना चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता || ॐ जय ||

धुप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो
मैया माँ स्वीकार करो
ज्ञान प्रकाश करो माँ, मोहा अज्ञान हरो || ॐ जय ||

महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता
ओ मैया जो कोई गाता
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता || ॐ जय ||

परशुराम चालीसा
॥दोहा॥

श्री गुरु चरण सरोज छवि,
निज मन मन्दिर धारि।
सुमरि गजानन शारदा,
गहि आशिष त्रिपुरारि॥

बुद्धिहीन जन जानिये,
अवगुणों का भण्डार।
बरणौं परशुराम सुयश,
निज मति के अनुसार॥

॥ चौपाई॥
जय प्रभु परशुराम सुख सागर,
जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर।

भृगुकुल मुकुट बिकट रणधीरा,
क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा।

जमदग्नी सुत रेणुका जाया,
तेज प्रताप सकल जग छाया।

मास बैसाख सित पच्छ उदारा,
तृतीया पुनर्वसु मनुहारा।

प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा,
तिथि प्रदोष ब्यापि सुखधामा।

तब ऋषि कुटीर रुदन शिशु कीन्हा,
रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा।

निज घर उच्च ग्रह छ: ठाढ़े,
मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े।

तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा,
जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा।

धरा राम शिशु पावन नामा,
नाम जपत जग लह विश्रामा।

भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर,
कांधे मुंज जनेउ मनहर।

मंजु मेखला कटि मृगछाला,
रूद्र माला बर वक्ष बिशाला।

पीत बसन सुन्दर तनु सोहें,
कंध तुणीर धनुष मन मोहें।

वेद-पुराण-श्रुति-समृति ज्ञाता,
क्रोध रूप तुम जग विख्याता।

दायें हाथ श्रीपरशु उठावा,
वेद-संहिता बायें सुहावा।

विद्यावान गुण ज्ञान अपारा,
शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा।

भुवन चारिदस अरू नवखंडा,
चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा।

एक बार गणपतिजी के संगा,
जूझे भृगुकुल कमल पतंगा।

दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा,
एक दन्त गणपति भयो नामा।

कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला,
सहस्त्रबाहु दुर्जन विकराला।

सुरगऊ लखि जमदग्नी पांही,
रखिहहुं निज घर ठानि मन मांहीं।

मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई,
भयो पराजित जगत हंसाई।

तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी,
रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी।

ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना,
तिन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा।

लगत शक्ति जमदग्नी निपाता,
मनहुँ क्षत्रिकुल बाम विधाता।

पितु- -बध मातु-रुदन सुनि भारा,
भा अति क्रोध मन शोक अपारा।

कर गहि तीक्षण परशु कराला,
दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला।

क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा,
पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा।

इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी,
छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी।

जुग त्रेता कर चरित सुहाई,
शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई।

गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना,
तब समूल नाश ताहि ठाना।

कर जोरि तब राम रघुराई,
विनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई।

भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता,
भये शिष्या द्वापर महँ अनन्ता।

शस्त्र विद्या देह सुयश कमाव,
गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा।

चारों युग तव महिमा गाई,
सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई।

देसी कश्यप सों संपदा भाई,
तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई।

अब लौं लीन समाधि नाथा,
सकल लोक नावइ नित माथा।

चारों वर्ण एक सम जाना,
समदर्शी प्रभु तुम भगवाना।

ललहिं चारि फल शरण तुम्हारी,
देव दनुज नर भूप भिखारी।

जो यह पढ़े श्री परशु चालीसा,
तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा।

पूर्णेन्दु निसि बासर स्वामी,
बसहु हृदय प्रभु अन्तरयामी।

॥ दोहा ॥
परशुराम को चारू चरित,
मेटत सकल अज्ञान।
शरण पड़े को देत प्रभु,
सदा सुयश सम्मान।

॥ श्लोक ॥
भृगुदेव कुलं भानुं सहस्रबाहुर्मर्दनम्।
रेणुका नयना नंद परशुंवन्दे विप्रधनम्॥

विश्वकर्मा भगवान की आरती
Table of Contents
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के करता, रक्षक स्तुति धर्मा ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,जय श्री विश्वकर्मा ।

आदि सृष्टि मे विधि को, श्रुति उपदेश दिया ।
जीव मात्र का जग में, ज्ञान विकास किया ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा ।

ऋषि अंगीरा तप से, शांति नहीं पाई ।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा ।

रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना ।
संकट मोचन बनकर, दूर दुःखा कीना ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा ।

जब रथकार दंपति, तुम्हारी टेर करी ।
सुनकर दीन प्रार्थना,विपत सगरी हरी ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा ।

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
त्रिभुज चतुर्भुज दशभुज, सकल रूप साजे ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा ।

ध्यान धरे तब पद का, सकल सिद्धि आवे ।
मन द्विविधा मिट जावे, अटल शक्ति पावे ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा ।

श्री विश्वकर्मा की आरती, जो कोई गावे ।
भजत गजानांद स्वामी,सुख संपति पावे ॥

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के करता,रक्षक स्तुति धर्मा ॥

माँ वैष्णो देवी की आरती
जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता।
हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता॥

शीश पे छत्र विराजे, मूरतिया प्यारी।
गंगा बहती चरनन, ज्योति जगे न्यारी॥

ब्रह्मा वेद पढ़े नित द्वारे, शंकर ध्यान धरे।
सेवक चंवर डुलावत, नारद नृत्य करे॥

सुन्दर गुफा तुम्हारी, मन को अति भावे।
बार-बार देखन को, ऐ माँ मन चावे॥

भवन पे झण्डे झूलें, घंटा ध्वनि बाजे।
ऊँचा पर्वत तेरा, माता प्रिय लागे॥

पान सुपारी ध्वजा नारियल, भेंट पुष्प मेवा।
दास खड़े चरणों में, दर्शन दो देवा॥

जो जन निश्चय करके, द्वार तेरे आवे।
उसकी इच्छा पूरण, माता हो जावे॥

इतनी स्तुति निश-दिन, जो नर भी गावे।
कहते सेवक ध्यानू, सुख सम्पत्ति पावे॥

ॐ जय कलाधारी हरे बाबा बालक नाथ जी की आरती

ॐ जय कलाधारी हरे,

स्वामी जय पौणाहारी हरे,
भक्त जनों की नैया,
दस जनों की नैया,
भव से पार करे,

ॐ जय कलाधारी हरे ॥

बालक उमर सुहानी,
नाम बालक नाथा,
अमर हुए शंकर से,
सुन के अमर गाथा ।
ॐ जय कलाधारी हरे ॥

शीश पे बाल सुनैहरी,
गले रुद्राक्षी माला,
हाथ में झोली चिमटा,
आसन मृगशाला ।
ॐ जय कलाधारी हरे ॥

सुंदर सेली सिंगी,
वैरागन सोहे,
गऊ पालक रखवालक,
भगतन मन मोहे ।
ॐ जय कलाधारी हरे ॥

अंग भभूत रमाई,
मूर्ति प्रभु रंगी,
भय भज्जन दुःख नाशक,
भरथरी के संगी ।
ॐ जय कलाधारी हरे ॥

रोट चढ़त रविवार को,
फल, फूल मिश्री मेवा,
धुप दीप कुदनुं से,
आनंद सिद्ध देवा ।
ॐ जय कलाधारी हरे ॥

भक्तन हित अवतार लियो,
प्रभु देख के कल्लू काला,
दुष्ट दमन शत्रुहन,
सबके प्रतिपाला ।
ॐ जय कलाधारी हरे ॥

श्री बालक नाथ जी की आरती,
जो कोई नित गावे,
कहते है सेवक तेरे,
मन वाच्छित फल पावे ।
ॐ जय कलाधारी हरे ॥

ॐ जय कलाधारी हरे,
स्वामी जय पौणाहारी हरे,
भक्त जनों की नैया,
भव से पार करे,

आरती श्री गंगा मैया जी

हर हर गंगे, जय माँ गंगे,
हर हर गंगे, जय माँ गंगे ॥

ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता ।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता ॥

चंद्र सी जोत तुम्हारी जल निर्मल आता ।
शरण पडें जो तेरी सो नर तर जाता ॥

॥ ॐ जय गंगे माता…॥

पुत्र सगर के तारे सब जग को ज्ञाता ।
कृपा दृष्टि तुम्हारी त्रिभुवन सुख दाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता…॥

एक ही बार जो तेरी शारणागति आता ।
यम की त्रास मिटा कर परमगति पाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता…॥

आरती मात तुम्हारी जो जन नित्य गाता ।
दास वही सहज में मुक्त्ति को पाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता…॥

ॐ जय गंगे माता श्री जय गंगे माता ।
जो नर तुमको ध्याता मनवांछित फल पाता॥

ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता ।

मां सिद्धिदात्री की आरती
जय सिद्धिदात्री मां, तू सिद्धि की दाता।

तू भक्तों की रक्षक, तू दासों की माता।

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि।

तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि।

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम।

जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम।

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है।

तू जगदम्बे दाती तू सर्व सिद्धि है।

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो।

तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो।

तू सब काज उसके करती है पूरे।

कभी काम उसके रहे ना अधूरे।

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया।

रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया।

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली।

जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली।

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा।

महा नंदा मंदिर में है वास तेरा।

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता।

भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता।

मां महागौरी की आरती Mahagauri Aarti
जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरी वहां निवासा॥

चंद्रकली ओर ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥

भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

सती {सत} हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥

तभी माँ ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥

शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

अहोई माता की आरती Ahoi Mata Aarti
जय अहोई माता,जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत,हर विष्णु विधाता ॥
॥ ॐ जय अहोई माता॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला,तू ही है जगमाता ।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत,नारद ऋषि गाता ॥
॥ ॐ जय अहोई माता॥

माता रूप निरंजन,सुख-सम्पत्ति दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत,नित मंगल पाता ॥
॥ ॐ जय अहोई माता॥

तू ही पाताल बसंती,तू ही है शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक,जगनिधि से त्राता ॥
॥ ॐ जय अहोई माता॥

जिस घर थारो वासा,वाहि में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले,मन नहीं घबराता ॥
॥ ॐ जय अहोई माता॥

एकादशी की आरती
Table of Contents
ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,

शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,

पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,

नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,

नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।

देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।

इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।

रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।

पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।

शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।

जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।

पितर जी की आरती
जय जय पितर महाराज, मैं शरण पड़यों हूँ थारी।

शरण पड़यो हूँ थारी बाबा, शरण पड़यो हूँ थारी।।

आप ही रक्षक आप ही दाता, आप ही खेवनहारे।

मैं मूरख हूँ कछु नहिं जाणूं, आप ही हो रखवारे।। जय।।

आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी, करने मेरी रखवारी।

हम सब जन हैं शरण आपकी, है ये अरज गुजारी।। जय।।

देश और परदेश सब जगह, आप ही करो सहाई।

काम पड़े पर नाम आपको, लगे बहुत सुखदाई।। जय।।

भक्त सभी हैं शरण आपकी, अपने सहित परिवार।

रक्षा करो आप ही सबकी, रटूँ मैं बारम्बार।। जय।।

जगदम्बा जी की आरती

आरती कीजै शैल – सुता की ।। टेक ।।
जगदम्बा की आरती कीजै ,

सनेह-सुधा, सुख सुन्दर लीजै ।
जीने नाम लेत दृर्ग भीजे,

ऐसी वह माता वसुधा की ।। आरती ॰ ।।

पाप विनाशनी, कलि -मल-हरिणी,
दयामयी भवसागर तारिणी ।

शस्त्र धारिणी शैल- विहारिणी,
बुद्धि- राशि गणपति माता की ।। आरती ॰ ।।

सिंहवाहिनी मातु भवानी,
गौरव- गान करें जग -प्राणी ।

शिव के हृदयासन की रानी,
करें आरती मिल -जुल ताकि ।। आरती ॰ ।।

श्री रामायण जी की आरती
आरती श्री रामायण जी की ।
कीरति कलित ललित सिया पी की ।।
आरती श्री रामायण जी की…

गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद,
बाल्मीकि विज्ञान विशारद ।

सुक सनकादि शेष अरू शारद,
बरनी पवन सुत कीर्ति निकी ।।
आरती श्री रामायण जी की …

गावत वेद पुराण अष्टदस,
छओं शाश्त्र सब ग्रन्थ को रस ।

मुनिजन धन संतन को सरबस,
सार अंश सम्मत सब ही की ।।
आरती श्री रामायण जी की…

गावत संतत शम्बू भवानी,
अरू घट संभव मुनि विग्यानी।

व्यास आदि कवी पुंज वखाणी,
काग भुसुंडि गरुड़ के ही की ।।
आरती श्री रामायण जी की…

कलिमल हरनि विषय रास फीकी,
सुभग सिगार मुक्ति जुवती की ।

दलन रोग भव भूरी अभी की,
तात मात सब विधि तुलसी की ।।
आरती श्री रामायण जी की…

माता जगदम्बा जी की आरती
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ।
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

पान सुपारी धव्जा नरिरल ले तेरी भेंट चढ़ाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

सुआ चोली तेरे अंग बिराजे, केसर तिलक लगाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे,शंकर तिलक लगाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

नंगे नंगे पग से तेरे सम्मुख से अकबर आया
सोने का छत्र चढ़ाया…
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

सतयुग द्वापर त्रेता मद्धया कलयुग राज सवाया ।।
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

धुप, दीप, नैवैध आरती मोहन भोग लगाया ।।
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

धयानू भक्त मैया तेरा गुण गाये मनबांछित्त फल पाया
सुन मेरी देवी पर्वत बासिनि तेरा पार न पाया ……

श्री रामचंद्र जी की आरती
आरती कीजै रामचंद्र जी की ।
हरि हरि दुष्ट दलन सीतापति जी की ।।

पहली आरती पुष्पन की माला ।
काली नागनाथ लाए गोपाला ।।

दूसरी आरती देवकी नंदन ।
भक्त उभारण कंस निकंदन ।।

तीसरी आरती त्रिभुवन मन मोहे ।
रतन सिंहासन सीताराम जी सोहे ।।

चौथी आरती चहुं युग पूजा ।
देव निरंजन स्वामी और न दूजा ।।

पांचवी आरती राम को भावे ।
राम जी का यश नामदेव जी गावे।।

गौ माता की आरती
आरती श्री गैय्या मैंय्या की,
आरती हरनि विश्वब धैय्या की,

अर्थकाम सुद्धर्म प्रदायिनि
अविचल अमल मुक्तिपददायिनि,

सुर मानव सौभाग्यविधायिनि,
प्यारी पूज्य नंद छैय्या,

अख़िल विश्वौ प्रतिपालिनी माता,
मधुर अमिय दुग्धान्न प्रदाता,

रोग शोक संकट परित्राता
भवसागर हित दृढ़ नैय्या की,

आयु ओज आरोग्यविकाशिनि,
दुख दैन्य दारिद्रय विनाशिनि,

सुष्मा सौख्य समृद्धि प्रकाशिनि,
विमल विवेक बुद्धि दैय्या की,

सेवक जो चाहे दुखदाई,
सम पय सुधा पियावति माई,

शत्रु मित्र सबको सुखदायी,
स्नेह स्वभाव विश्व जैय्या की,

॥ इति आरती श्री गौमता जी की ॥

 

 

॥ आरती ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥

जाके बल से गिरवर काँपे ।
रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई ।
संतन के प्रभु सदा सहाई ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥

दे वीरा रघुनाथ पठाए ।
लंका जारि सिया सुधि लाये ॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई ।
जात पवनसुत बार न लाई ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥

लंका जारि असुर संहारे ।
सियाराम जी के काज सँवारे ॥
लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे ।
लाये संजिवन प्राण उबारे ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥

पैठि पताल तोरि जमकारे ।
अहिरावण की भुजा उखारे ॥
बाईं भुजा असुर दल मारे ।
दाहिने भुजा संतजन तारे ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥

सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें ।
जय जय जय हनुमान उचारें ॥
कंचन थार कपूर लौ छाई ।
आरती करत अंजना माई ॥
आरती कीजै हनुमान लला की ॥

जो हनुमानजी की आरती गावे ।
बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥
लंक विध्वंस किये रघुराई ।
तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥