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आदि गौड़ों ब्राह्मण का वृत्तान्त

ब्राह्मण एक ही जाति पंच गौड़ों में कहै जो सारस्वत, कान्य कुब्ज, उत्कल और मैथिल है ये भी गौड़ ही हैं, परन्तु मिन्न भिन्न देशों में बसने से इनके नाम बदल गये हैं, जैसे सरस्वती नदी के किनारे के देशों में बसने से “सारस्वत” कन्नौज के राज्य में बसने से “कान्यकुब्ज” उत्कल देश में बसने से “उत्कल” मिथिलापुर से बसने मे मैथिल नाम पड़ा. परन्तु जो गौड़ अयाचक धर्म का पालन करते हुए अपने प्राचीन गौड़ देश में ही निवास करते रहे वे अब तक भी आदि गौड़ कहलाते हैं। सबसे से पहले इन्हीं यादि गौड़ ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा हुई थी जो महाराजा जन्मेजय ने की थी। महाराजा जन्मेजय महाराजा परीक्षित के पश्चात् तथा महाराजा अश्वमेध से पूर्व के हैं। इनके राज्य काल की अवधि ८४ वर्ष ७ मास २३ दिन की रही थी |

आदि गौड़ ब्राह्मणों के सम्बन्ध में राजा जन्मेजय और बटेश्वर मुनि के १४४४ शिष्यों के प्रमाण निम्नांकित उपलब्ध हुए ग्रन्थों में मिले हैं

यथा :

“ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड” के पृष्ठ संख्या ४२६ से ४२८ तक । बम्बई ।

“जाति भास्कर” के पृष्ठ संख्या ७३ से ७४ तक । बम्बई । “ब्राह्मण निर्माथ” ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या १५४ से आगे | फुलेरा ।

“नित्यकर्म प्रयोगमाला” ग्रन्थ के पृष्ट संख्या २६४ से २६६ तक | बम्बई  ।

“श्री आदि गौड़ प्रदीपिका” ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या २८ से २६ तथा ७४ से ७५ तक ।

“ब्राह्मणोत्पत्ति” ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या १३ से १४ तक । अलीगढ़ |

इस आर्यावर्त्त के बीच पूर्वकाल में महाराजा जनमेजय एक बड़े चक्रवर्ती राजा हो चुके हैं। एक समय उन्होंने बहुत बड़ा यज्ञ किया था, जिसमें बड़े बड़े ऋषि मुनि विद्वान् एकत्रित हुए थे जिसमें बटेश्वर मुनि को १४४४ शिष्यों सहित यज्ञ कराने को बुलाया था। यज्ञ की समाप्ति होने पर राजा अपने गुरु बटेश्वर मुनि को शिष्यों सहित महापूजा करके दक्षिणा देने को तैयार हुवा, बटेश्वर मुनि अयाचक ब्राह्मण थे वे राज प्रतिग्रह भी नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने दक्षिणा लेना स्वीकार नहीं किया। तब राजा ने कहा कि “बिना दक्षिणा दिये यज्ञ पूरा (सफल) नहीं होता है। इस प्रकार राजा के बहुत कहने पर मुनि और शिष्यों ने केवल एक एक पान का बीड़ा लेना स्वीकार किया, तब राजा ने बड़ी चतुराई से १४४४ संकल्प पत्रिका लिखवाई अर्थात् प्रत्येक चिट्ठी में एक एक ग्राम का दान का संकल्प था सो एक एक चिठ्ठी पान के प्रत्येक वीड़े में रखवाकर चलते समय दिये मुनि और शिष्यों ने राजा को आशीर्वाद दिया। अचानक मुनि और शिष्यों की जल पर गमन की गति नष्ट हो गयी। जब पान खोल कर देखे गये तब यह गुप्त दान का भेद खुला। अन्त में यही हुआ कि जो जो ग्राम जिस जिस को मिला वह उसी में बसा और जिस ग्राम या नगर में बसा उसी पर उसका शासन हुआ, इन शासनों को कोई और अवटंक भी कहते हैं ।

बंगदेश से लेकर अमरनाथ पर्यन्त गौड़ देश की स्थिति है ऐसा एक श्लोक “आदि गौड़ दीपिका” ग्रन्थ में लिखा

गौड़देशं समारभ्य मुत्रनेशातयः शिवे ।
गौड़ देशः समाख्यातः सर्वविद्या विशारदः ||

मध्यदेश के अवान्तर आरण्यदेश जिसको हरियाणा और जंगल देश कहते हैं, तथा दिल्ली का प्रान्त सोनीपत, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, ल्यु केवल यमुना के प्रान्त का देश, हस्तिनापुर, मारवाड़, एभुन् फतेहपुर शेखावाटी, पुष्कर, मत्यस्य (अलवर व भरतपुर), विराट ( बैराठ ), भिवानी आदि स्थानों में गौड़ ब्राह्मणों का निवास है। अयो ध्या के उत्तर सरयू नदी और सरयू के उत्तर सरकार तथा गौड देश है, यह ‘ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड’ ग्रंथ के रचियता का मत है। मत्स्यपुराण के अ० १२ श्लोक ३० पर तथा वायु पुराण के भाग २ अ० २६ श्लोक १६८ में श्रावस्तीपुरी का वर्णन गौढ़ देश में किया गया है।

यह श्रावस्तीपुरी गौड़ देश में इस समय मी सरयू नदी के उत्तर गोंडा नगर के समीप वर्तमान हैं, जिस देश की सीमा पूर्व में गंगा और गण्डकी का सम है, पश्चिम और दक्षिण दिशा में सरयू है, उत्तर में हिमालय है इसके मध्य की भूमि का नाम गौड़ देश है गण्डकी नदी की पश्चिमी भूमि गौड़ देश कहलाती है।

इस स्थान में जो ब्राह्मण सृष्टि के आरम्भ से निवास करते हैं वे आदि गौड़ कहलाते हैं। पाँच गौड़ ब्राह्मणों शासन, गोत्र और पदवी