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Basant Panchami 2022 : बच्चे में है वाणी दोष या पढ़ने में नहीं लगता है मन, तो जरूर करें ये उपाय

मां सरस्वती (Maa Saraswati) की आराधना का दिन बसंत पंचमी (Basant Panchami) का त्योहार आने वाला है. हर साल माघ मास की पंचमी तिथि (Magh Month Panchami Tithi) को ये दिन सेलिब्रेट किया जाता है. इसे माता सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस बार बसंत पंचमी का पर्व 5 फरवरी को मनाया जाएगा. शास्त्रों में बताया गया है कि माता सरस्वती के हाथ में वीणा, पुस्तक और माला लिए हुए वर-मुद्रा में श्वेत कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुई थीं. जैसे ही उन्होंने वीणा से मधुरनाद छेड़ा, समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल और हवा में सरसराहट होने लगी. तब देवी सरस्वती को ज्ञान, विद्या, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी कहा जाने लगा.

बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की विशेष पूजा की जाती है. ज्ञान और वाणी की देवी होने के कारण माता सरस्वती की उपासना से मूर्ख भी विद्वान बन सकता है और वाणी से जुड़ी हर समस्या दूर हो सकती है. अगर आपके बच्चे में किसी तरह का वाणी दोष है या उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता है तो बसंत पंचमी के दिन यहां बताए जा रहे उपाय जरूर करें.

वाणी दोष दूर करने के लिए

अगर आपके बच्चे को वाणी दोष है तो बसंत पंचमी के दिन उसकी जीभ पर चांदी की सलाई या पेन की नोक से केसर द्वारा ‘ऐं’ लिखें. इससे बच्चे की जुबां स्पष्ट होती है और उसका वाणी दोष समाप्त हो जाता है. साथ ही वो बात करने की कला में निपुण होता है.

अगर बच्चे का मन पढ़ने में नहीं लगता

अगर आपका बच्चा पढ़ाई से जी चुराता है तो बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती को हरे रंग फल अर्पित करने चाहिए. इसके अलावा माता सरस्वती का एक चित्र बच्चे के स्टडी रूम में स्टडी टेबल के पास चिपकाएं और उसे पढ़ाई करने से पहले नियमित रूप से माता को प्रणाम करने के लिए कहें. पूजा के बाद बच्चे की जीभ पर शहद से ॐ बनाना चाहिए. इससे बच्चा ज्ञानवान बनता है.

बसंत पंचमी की पूजा विधि

सुबह स्नान के बाद पूजा के स्थान की सफाई करें और रंगोली या चौक बनाएं. एक चौकी पर मां सरस्वती की प्रतिमा रखें. उन्हें पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें और खुद भी पीले वस्त्र धारण करें. इसके बाद पीला चंदन, हल्दी, केसर, हल्दी से रंगे अक्षत, पीले पुष्प आदि मातारानी को अर्पित करें और पीले मीठे चावल का भोग लगाएं. पूजा के स्थान पर वाद्य यंत्र और किताबों को रखें और उनकी भी पूजा करें. माता के मंत्र, वंदना आदि करें. इसके बाद प्रसाद खाकर व्रत खोलें.

 

(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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