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भूमिहार ब्राह्मण का इतिहास, वर्तमान एवं भविष्य

भूमिहार एक भारतीय जाति है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड तथा थोड़ी संख्या में अन्य प्रदेशों में निवास करती है। भूमिहार का अर्थ होता है “भूमिपति” , “भूमिवाला” या भूमि से आहार अर्जित करने वाला (कृषक) । भूमिहार जाति के लोग ब्राह्मण होने का दावा करते हैं, और उन्हें भूमिहार ब्राह्मण भी कहा जाता है। बिहार में, उन्हें बाभन[3] के रूप में भी जाना जाता है।

भूमिहार 20 वीं शताब्दी तक पूर्वी भारत के एक प्रमुख भू-स्वामी समूह थे, और इस क्षेत्र में कुछ छोटी रियासतों और जमींदारी संपदाओं को नियंत्रित करते थे। भूमिहार समुदाय ने भारत के किसान आंदोलनों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 20 वीं शताब्दी में भूमिहार बिहार की राजनीति में अत्यधिक प्रभावशाली थे।

व्युत्पत्ति
भूमिहार शब्द अपेक्षाकृत हाल का है, पहली बार 1865 में आगरा और अवध के संयुक्त प्रांतों के रिकॉर्ड में इस्तेमाल किया गया था। यह शब्द “भूमि” से निकला है, जो जाति की भूमि की स्थिति का उल्लेख करता है। भूमिहार ब्राह्मण शब्द को समुदाय द्वारा 19 वीं शताब्दी के अंत में पुजारी ब्राह्मण वर्ग के अपने दावे पर जोर देने के लिए अपनाया गया था। वैकल्पिक नाम “बाभन” को “ब्राह्मण” के लिए एक विकृत बोलचाल की भाषा के रूप में वर्णित किया गया है।

भूमिहार ब्राह्मणों के वंशज होने का दावा करते हैं, हालांकि, अन्य समुदायों ने उन्हें ब्राह्मणों का स्थान नहीं दिया, क्योंकि उनमें से अधिकांश ब्रिटिश राज के दौरान कृषक थे। ब्रिटिश भारत के कुछ शुरुआती जनगणना ने भूमिहारों को शूद्रों के रूप में वर्गीकृत किया, जो चार वर्णों में सबसे नीचे थे।

इतिहास

भारत में कई जातियों के साथ, भूमिहार समुदाय की उत्पत्ति के बारे में कई मिथक हैं। एक किंवदंती का दावा है कि उनके पूर्वज ब्राह्मण थे, जिन्हें परशुराम द्वारा मारे गए क्षत्रियों के स्थान पर लेने के लिए स्थापित किया गया था, लेकिन कुछ गैर-भूमिहारों ने आरोप लगाया है कि वे ब्राह्मण पुरुषों और क्षत्रिय महिलाओं की मिश्रित जाति के वंशज हैं। अन्य किंवदंतियों में कहा गया है कि वे राजपूत पुरुषों और ब्राह्मण महिलाओं के बीच मिलाप की संतान हैं, या वे ब्राह्मण-बौद्धों से उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने हिंदू समाज में अपना उच्च स्थान खो दिया था। भूमिहार स्वयं “संकरता” या “गिरी हुई स्थिति” वाले इन आख्यानों को नापसंद करते हैं, और शुद्ध ब्राह्मण होने का दावा करते हैं।

16 वीं शताब्दी तक, भूमिहारों ने पूर्वी भारत में, विशेष रूप से उत्तर बिहार में भूमि के विशाल हिस्सों को नियंत्रित किया। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, बिहारी राजपूतों के साथ, उन्होंने खुद को इस क्षेत्र के सबसे प्रमुख जमींदारों के रूप में स्थापित किया था।

विक्रमीय संवत् 1584 (सन् 1527) मदारपुर के अधिपति भूमिहार ब्राह्मणों और बाबर से युद्ध हुआ और युद्धोपरांत भूमिहार मदारपुर से पलायन कर यू.पी. एवं बिहार के बिभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गए | गौड़, कान्यकुब्ज सर्यूपारी, मैथिल, सारस्वत, दूबे और तिवारी आदि नाम प्राय: ब्राह्मणों में प्रचलित हुए, वैसे ही भूमिहार या भुइंहार नाम भी सबसे प्रथम कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के एक अयाचक दल विशेष में प्रचलित हुआ।

भूमिहार शब्द सबसे प्रथम ‘बृहत्कान्यकुब्जकुलदर्पण’ (1526) के 117वें पृष्ठ पर मिलता है| इसमें लिखा हैं कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण के निम्नलिखित पांच प्रभेद हैं:-

(1) प्रधान कान्यकुब्ज
(2) सनाढ्य
(3) सरवरिया
(4) जिझौतिया
(5) भूमिहार
सन् 1926 की कान्यकुब्ज महासभा का जो 19वाँ वार्षिक अधिवेशन प्रयाग में जौनपुर के राजा श्रीकृष्णदत्तजी दूबे, की अध्यक्षता में हुई थी|स्वागताध्यक्ष जस्टिस गोकरणनाथ मिश्र ने भी भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग माना है|

यद्यपि इनकी संज्ञा प्रथम जमींदार या जमींदार ब्राह्मण थी लेकिन एक तो, उसका इतना प्रचार न था, दूसरे यह कि जब पृथक्-पृथक् दल बन गये तो उनके नाम भी पृथक-पृथक होने चाहिए| परन्तु जमींदार शब्द तो जो भी जाति भूमिवाली हो उसे कह सकते हैं। इसलिए विचार हुआ कि जमींदार नाम ठीक नहीं हैं। क्योंकि पीछे से इस नामवाले इन अयाचक ब्राह्मणों के पहचानने में गड़बड़ होने लगेगी। इसी कारण से इन लोगों ने अपने को भूमिहार या भुइंहार कहना प्रारम्भ कर दिया। हालांकि जमींदार और भूमिहार शब्द समानार्थक ही हैं, तथापि जमींदार शब्द से ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय आदि जातियाँ भी समझी जाती हैं, परन्तु भूमिहार शब्द से साधारणत: प्राय: केवल अयाचक ब्राह्मण विशेष ही क्योंकि उसी समाज के लिए उसका संकेत किया गया हैं।

आईन-ए-अकबरी, उसके अनुवादकों और उसके आधार पर इतिहास लेखकों के भी मत से भूमिहार ब्राह्मण लोग ब्राह्मण सिद्ध होते हैं। कृषि करने वाले या जागीर प्राप्त करने बाले भूमिहारों के लिए ‘जुन्नारदार’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका मतलब होता है “जनेऊ पहनने वाला ब्राह्मण”| फिर वहाँ भूमिहार लोग ब्राह्मण हैं या नहीं इस संशय की जगह ही कहाँ हैं?

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन है| प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारी, मैथिल, चितपावन, कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए| मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए |

दंडीस्वामी श्री सहजानंद सरस्वती जी के अनुसार अयाचकता और याचकता किसी विप्र समाज या जाति का धर्म न होकर व्यक्ति का धर्म हैं। जो आज अयाचक हैं कल वह चाहे तो याचक हो सकता हैं और याचक अयाचक। इसी सिद्धांत और परम्परा के अनुसार जब याचक ब्राह्मणों को दान स्वरूप भू-संपत्ति और ग्राम दान मिलने लगे तो याचकों को भू-धन प्रबंधन की जटिलताएं सताने लगीं| पौरोहित्य जन्य कर्मों में संलग्न याचक वर्ग दान में मिली भू-सम्पत्तियों के प्रबंधन के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था| इसलिए आंतरिक श्रम विभाजन के सिद्धांत पर आपसी सहयोग और सम्मति से परिवार के कुछ सदस्य अपनी रूचि अनुसार भू-प्रबंधन में संलग्न हो गए|

ब्राह्मणों के पेशागत परिवर्तन के उदाहरण वैदिक काल में परशुराम, द्रोण, कृप, अश्‍वत्थामा, वृत्र, रावण एवं ऐतिहासिक काल में शुंग, शातवाहन, कण्व, अंग्रेजी काल में काशी की रियासत, दरभंगा, बेतिया, हथुआ, टिकारी, तमकुही, सांबे, मंझवे, आदि के जमींदार हैं।