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pitr puja

Sradh / Pitar Puja पितृपक्ष यानी श्राद्ध

कब से शुरू होगा पितृ पक्ष? श्राद्ध तिथि, महत्व, विधि और सामग्री की पूरी लिस्ट”

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का बहुत अधिक महत्व होता है। पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है। पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। विष्णु पुराण में कहा गया है- श्रद्धा तथा भक्ति से किए गए श्राद्ध से पितरों के साथ ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, आठों वसु, वायु, विश्वदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, ऋषिगण तथा अन्य समस्त मृत प्राणी तृप्त होते हैं।


यदि मृतक का अंतिम संस्‍कार विधि-विधान से न किया जाए या किसी की अकाल मृत्‍यू हो जाए तो उसके परिवार पर पितृ दोष लगता है. इसका असर कई पीढ़ियों तक रहता है. पितृ दोष के कारण उस परिवार आर्थिक तंगी झेलता है. लोगों की तरक्‍की नहीं होती है. घर में झगड़े-कलह होते हैं. लड़के-लड़कियों का विवाह नहीं होता है. संतान सुख नहीं मिलता है. यदि संतान हो भी तो उसे कोई शारीरिक-मानसिक समस्‍या रहती है. परिवार के बच्‍चे बुरी संगत में पड़कर जीवन तबाह कर बैठते हैं. नौकरी और व्‍यवसाय में मेहनत करने के बावजूद भी लगातार नुकसान होता रहता है. परिवार का सदस्‍य हमेशा बीमार रहता है. घर में मांगलिक कार्य नहीं होते हैं.

धार्मिक मान्यता अनुसार पितृपक्ष में सभी प्रकार के मांगलिक व शुभ कार्य वर्जित होते हैं. शास्त्रों में देवी-देवताओं की पूजा के साथ पूर्वजों की पूजा वर्जित है. ऐसे में अब सवाल उठता है कि पितृपक्ष में देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए या नहीं,

पितरों को पूज्यनीय माना गया है. पितृ लोग पितृपक्ष के दौरान धरती पर वास करते हैं. ऐसे में इस दौरान पितरों की पूजा करना बेहद कल्याणकारी माना गया है. लेकिन अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि पितर पक्ष के दौरान देवी-देवता की पूजा करनी चाहिए कि नहीं तो हम आपको बता दें कि पितर पक्ष में प्रतिदिन की तरह ही पूजा करनी चाहिए, क्योंकि पितर देव हमारे लिए जरूर पूज्यनीय हैं. लेकिन हमारे ईश्वर से उच्च नहीं हैं.

पितृपक्ष के दौरान प्रातः काल स्नान करने के बाद नित्य की तरह ही देवी-देवता की पूजा करनी चाहिए.
देवी देवताओं के पूजा के बिना पितृपक्ष में श्राद्ध, पिंडदान इत्यादि का फल नहीं मिलता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितर संबंधित कार्य करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पक्ष में विधि- विधान से पितर संबंधित कार्य करने से पितरों का आर्शावाद प्राप्त होता है।

पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से होती है।

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि तक पितृ पक्ष रहता है।

पितृपक्ष यानी श्राद्ध का हिंदू धर्म में विशेष महत्व होता है। पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करके उनका श्राद्ध कर्म किया जाता है। पितृपक्ष में पितरों को तर्पण देने और श्राद्ध कर्म करने से उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दौरान न केवल पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है, बल्कि उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए भी किया जाता है। पितृपक्ष में श्रद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों को जल देने का विधान है। ऐसे में चलिए जानते हैं तर्पण विधि, नियम, सामग्री और मंत्र के बारे में…

पितृपक्ष में आप गया, गोदावरी तट और प्रयाग में श्राद्ध- तर्पण नहीं कर सकते हैं तो घर पर रहकर भी पितरों को खुश कर सकते हैं। महाभारत और पद्मपुराण सहित अन्य स्मृति ग्रंथों में कहा गया है कि जो पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त सामर्थ्य के अनुरूप पूरी विधि से श्राद्ध करता है, उसकी इच्छाएं पूरी होती हैं। घर-परिवार में शांति होती है। व्यवसाय तथा आजीविका में उन्नति होती है। साथ ही हर तरह की रुकावटें दूर हो जाती हैं।

श्राद्ध तिथि पर सूर्योदय से दिन के 12 बजकर 24 मिनट की अवधि के बीच ही श्राद्ध करें।

इसके लिए सुबह उठकर नहाएं, उसके बाद पूरे घर की सफाई करें। घर में गंगाजल और गौमूत्र भी छीड़कें।

दक्षिण दिशा में मुंह रखकर बांए पैर को मोड़कर, बांए घुटने को जमीन पर टीका कर बैठ जाएं। इसके बाद तांबे के चौड़े बर्तन में काले तिल, गाय का कच्चा दूध, गंगाजल और पानी डालें। उस जल को दोनों हाथों में भरकर सीधे हाथ के अंगूठे से उसी बर्तन में गिराएं। इस तरह 11 बार करते हुए पितरों का ध्यान करें।

घर के आंगन में रंगोली बनाएं। महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं। श्राद्ध के अधिकारी श्रेष्ठ व्यक्ति या ब्राह्मण को न्यौता देकर बुलाएं। भोजन करवाएं ।


पितृपक्ष में तर्पण विधि

श्राद्ध पूजा की सामग्री: रोली, सिंदूर, छोटी सुपारी , रक्षा सूत्र, चावल, जनेऊ, कपूर, हल्दी, देसी घी, माचिस, शहद, काला तिल, तुलसी पत्ता , पान का पत्ता, जौ, हवन सामग्री, गुड़ , मिट्टी का दीया , रुई बत्ती, अगरबत्ती, दही, जौ का आटा, गंगाजल, खजूर, केला, सफेद फूल, उड़द, गाय का दूध, घी, खीर, स्वांक के चावल, मूंग, गन्ना।

श्राद्ध में सफेद फूलों का ही उपयोग करें। श्राद्ध करने के लिए दूध, गंगाजल, शहद, सफेद कपड़े, अभिजित मुहूर्त और तिल मुख्य रूप से जरूरी है।
पितरों के निमित्त अग्नि में गाय के दूध से बनी खीर अर्पण करें।

पितृपक्ष के दौरान प्रतिदिन पितरों के लिए तर्पण करना चाहिए। तर्पण के लिए आपको कुश, अक्षत्, जौ और काला तिल का उपयोग करना चाहिए। तर्पण करने के बाद पितरों से प्रार्थना करें और गलतियों के लिए क्षमा मांगें।

पितृ आमंत्रित करेंः- ‘ओम आगच्छन्तु में पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम’ इस मंत्र का अर्थ है, हे पितरों, पधारिये और जलांजलि ग्रहण कीजिए।


पितृपक्ष प्रार्थना मंत्र
1- पितृभ्य:स्वधायिभ्य:स्वधा नम:।
पितामहेभ्य:स्वधायिभ्य:स्वधा नम:।
प्रपितामहेभ्य:स्वधायिभ्य:स्वधा नम:।
सर्व पितृभ्यो श्र्द्ध्या नमो नम:।।

2- ॐ नमो व :पितरो रसाय नमो व:
पितर: शोषाय नमो व:
पितरो जीवाय नमो व:
पीतर: स्वधायै नमो व:
पितर: पितरो नमो वो
गृहान्न: पितरो दत्त:सत्तो व:।।


इस मंत्र से पिता जी के लिए तर्पण किया जाता है-
सबसे पहले गंगा जल में या फिर सादे जल में दूध, जौ और तिल मिला लें उसके बाद अंजलि में जल लेकर तीन बार पिता को जलांजलि देते हुए इस मंत्र का जप करें,

(अपने गोत्र का नाम लेकर बोलें) गोत्रे अस्मतपिता (पिता जी का नाम) शर्मा वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।

माता जी के तर्पण के लिए मंत्र
जलांजलि देते वक्त अपने गोत्र का नाम लेते हुए कहें-

(अपने गोत्र का नाम लेकर बोलें) गोत्रे अस्मन्माता (माता का नाम) देवी वसुरूपास्त् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जल वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।

दादा जी के तर्पण के लिए मंत्र
दादा जी को जलांजलि देने के लिए अपने गोत्र का नाम लेते हुए बोलें,

(अपने गोत्र का नाम लेकर बोलें) गोत्रे अस्मत्पितामह (दादा जी का नाम) शर्मा वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।

दादी के तर्पण में जल देने का मंत्र
दादी जी को जलांजलि देते समय अपने गोत्र का नाम लेते हुए इस मंत्र का उच्चारण कीजिए-

(अपने गोत्र का नाम लेकर बोलें) गोत्रे पितामां (दादी का नाम) देवी वसुरूपास्त् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जल वा तस्मै स्वधा नमः,तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।

पितृ गायत्री मंत्र
अगर उपर दिए मंत्रों को पढ़ने में आपको कोई परेशानी आ रही है तो पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए पितृ गायत्री पाठ भी पढ़ सकते हैं। इसके अलावा पितृ गायत्री मंत्र पढ़ने से भी पितरों की आत्मा को मुक्ति मिलती है तथा उनका आशीर्वाद भी मिलता है।
पितृ गायत्री मंत्र-

ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदयात्।
ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:।
ॐ आद्य-भूताय विद्महे सर्व-सेव्याय धीमहि। शिव-शक्ति-स्वरूपेण पितृ-देव प्रचोदयात्।

श्रेष्ठ व्यक्ति या ब्राह्मण भोजन से पहले पंचबलि यानी गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें।

दक्षिणाभिमुख (दक्षिण दिशा में मुंह रखकर) होकर कुश, जौ, तिल, चावल और जल लेकर संकल्प करें और एक या तीन श्रेष्ठ व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराएं। इसके बाद भोजन थाली अथवा पत्ते पर ब्राह्मण हेतु भोजन परोसें।

भोजन के पश्चात : ॐ विष्णवे नम:, ॐ विष्णवे नम:, ॐ विष्णवे नम: कहकर श्राद्ध-दान का समापन करें।

प्रसन्न होकर भोजन परोसें। भोजन के उपरांत यथाशक्ति दक्षिणा और अन्य सामग्री दान करें। इसमें गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, अनाज, गुड़, चांदी तथा नमक (जिसे महादान कहा गया है) का दान करें। साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सकें तो बहुत पुण्य मिलता है। हर गृहस्थ को चाहिए कि वह द्रव्य से देवताओं को, कव्य से पितरों को, अन्न से अपने बंधुओं-अतिथियों तथा भिक्षुओं को भिक्षा देकर प्रसन्न करें। इससे उन्हें यश, पुष्टि तथा उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। गौ दान, भूमि दान या इनके खरीदने के लिए धन देने का विधान है।

इसके बाद निमंत्रित ब्राह्मण की चार बार प्रदक्षिणा कर आशीर्वाद लें। ब्राह्मण को चाहिए कि स्वस्तिवाचन तथा वैदिक पाठ करें तथा गृहस्थ एवं पितर के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त करें।

 

संकल्प के किए गए देव कार्य या पितृ कार्य सर्वथा व्यर्थ हैं। विधि विधान से शुभ संकल्प इस प्रकार किया जाता है|

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु, ॐ नम: परमात्मने श्री पुराण पुरुषोत्तमस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्री ब्रह्मणो द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे वैवस्वत् मन्वन्तरेअष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भारतवर्षे भरत खण्डे आर्यावन्तार्गत ब्रह्मावर्तेक देशे पुण्यप्रदेशे (यदि विदेश में कहीं हो तो रेखांकित के स्थान पर उस देश, शहर, ग्राम का नाम बोलें।) नाम संवत्सरे दक्षिणायने अमुक ऋतौ (ऋतु का नाम) अमुक मासे (महीने का नाम) अमुक पक्षे (शुक्ल या कृष्ण पक्ष का नाम) अमुक तिथौ (तिथि का नाम) अमुक वासरे (वार का नाम) अमुक नक्षत्रे (नक्षत्र का नाम) अमुक राशि स्थिते चन्द्रे (जिस राशि में चन्द्र हो का नाम) अमुक राशि स्थिते सूर्ये (सूर्य जिस राशि में स्थित हो का नाम) अमुक राशि स्थिते देवगुरौ बृहस्पति (गुरु जिस राशि में स्थित हो का नाम) अमुक गौत्रोत्पन्न (अपने गौत्र तथा स्वयं का नाम) अमुक शर्मा/ वर्मा अहं समस्त पितृ पितामहांनां नाना गौत्राणां पितरानां क्षुत्पिपासा निवृत्तिपूर्वकं अक्षय तृप्ति सम्पादनार्थं ब्राह्मण भोजनात्मकं सांकल्पित श्राद्धं पंचबलि कर्म च करिष्ये।

हाथ में जल लेकर इतना कहकर जल छोड़ें। आमान्न यानी कच्चा भोजन देने के लिए रेखांकित के स्थान पर ” इदं अन्नं भवदभ्यो नम: ” कहें।

 

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पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करने वाले लोग बरतें ये सावधानी

पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए जो भी श्राद्ध कर्म करते हैं, उन्हें इस दौरान बाल और दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए। साथ ही इन दिनों में घर पर सात्विक भोजन ही बनाना चाहिए। तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज करना चाहिए।

पितृपक्ष का महत्व
कहा जाता है कि पूर्वजों की तीन पीढ़ियों की आत्माएं पितृलोक में निवास करती हैं। पितृलोक स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का स्थान माना जाता है। यह क्षेत्र मृत्यु के देवता यम द्वारा शासित है, जो एक मरते हुए व्यक्ति की आत्मा को पृथ्वी से पितृलोक तक ले जाता है। ऐसे में जब आप पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म करते हैं तो पितरों को मुक्ति मिलती है और वे स्वर्ग लोग में चले जाते हैं।


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पितृ दोष दूर करने के उपाय

घर की मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमा के साथ पूर्वजों की तस्वीर न लगाएं. ऐसा करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और घर में वास्तु दोष लगता है.
वास्तु शास्त्र के अनुसार पितरों की तस्वीर हमेशा घर में इस तरह लगाएं कि जहां उनका मुख दक्षिण दिशा की तरफ रहे.
वास्तु के अनुसार घर में पितरों की एक से अधिक तस्वीर नहीं होनी चाहिए.

– पीपल के पेड़ पर दोपहर में जल चढ़ाएं. साथ ही फूल, अक्षत, दूध और काले तिल भी चढ़ाएं.

– शाम को दक्षिण दिशा में रोज एक दीपक जलाएं. यदि ऐसा संभव न हो तो भी कम से कम पितृ पक्ष के दौरान जरूर ऐसा करें.

पितृ दोष के प्रभाव को कम करने के लिए भगवान शिव का मंत्र (ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात) का जाप करें या फिर महामृत्युंजय मंत्र ( ॐ त्र्यम्बकं स्यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥) का पाठ करें।

भगवान शिव से अपने पितरों की मुक्ति के लिए श्रद्धापूर्ण ढंग से प्रार्थना करें। ऐसा करने से कुंडली में पितृ दोष का प्रभाव जीवन से धीरे-धीरे कम होने लगेगा और जीवन में सुख और समृद्धि आना शुरू हो जाएगी।

अगर आपकी कुंडली में पितृ दोष है तो आपको रोज़ ऐसे मंदिर में जाना चाहिए जहां पर पीपल का वृक्ष हो। पीपल के वृक्ष को भगवान विष्णु के रूप में पूजा जाता है और भगवान विष्णु वैकुण्ठ धाम के स्वामी है। ऐसे मंदिर में जाकर आप पीपल के वृक्ष पर दूध और जल मिलाकर अर्पित करें।

जल चढ़ाते समय ॐ पितृ देवतायै नम: का जाप करें। शाम के वक्त मंदिर में जाकर पीपल के वृक्ष के नीचे सरसो के तेल का दीपक जलाएं। ऐसा करने से पितृ प्रसन्न हो जाते हैं और जीवन से कई सारे दुखों का निवारण होने लगता है। इसके इलावा आप पितृ दोष निवारण कवच पाठ भी आप रोज़ कर सकते है।

पूजा के बाद अपने पितरों से आपसे हुई भूल-चूक की क्षमा मांगे और समृद्धि में सहायक होने का आशीर्वाद मांगे। ऐसे में पितृ प्रसन्न होते हैं और कुंडली में पाया जाने वाले पितृ दोष का प्रभाव खत्म हो जाता है।

पितृ दोष निवारण मंत्र
ॐ पितृ देवतायै नम:
ॐ पितृ गणाय विद्महे जगतधारिणे धीमहि तन्नो पित्रो प्रचोदयात्।
ऊपर दिए हुए किसी एक मंत्र का भी आप उपयोग कर सकते है और यह मंत्र आपको 108 बार प्रतिदिन जाप करना है !

पितृ दोष निवारण मंत्र पाठ बिधी
हर रोज़ ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आधी कर लें।
घर के मंदिर में धुप अगरबत्ती जलाएं, एक पवित्र लोटा जल भर ले और उसमें गंगा जल और एक पुष्प डाल दें।
इसके बाद 108 बार गायत्री मंत्र का जाप कर लें।
अपने पितृ का समरण करते हुए ऊपर लिखे हुए पितृ दोष मंत्र निवारण का जाप १०८ बार करें और अंत में उनका आशीर्वाद सदा आप और आपके परिवार पर बना रहें ऐसी प्रार्थना करें।

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