षड्बल – ग्रहों का बल और प्रभाव
षड्बल से ही वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के बल का माप किया जाता है। षड्बल ज्योतिष विज्ञान का वह हिस्सा है जो ग्रहों की तमाम छह प्रकार की शक्तियों का आकलन करता है। इन छह प्रकार की शक्तियों के बारे में हम अगले लेख में विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगे।
परन्तु आज “षड्बल: Chapter 1” के अपने इस लेख में आप ये जान सकेंगे कि षड्बल की गणना के अंतर्गत राहु और केतु के अलावा अन्य दूसरे सात ग्रहों की शक्तियों और उनकी गतिशीलता की गणना की जाती है। इसके अंतर्गत सर्वाधिक अंक हासिल करने वाला ग्रह बली होता है और वो ग्रह अपनी दशा और अंतर्दशा में संपूर्ण फल देता है। जबकि यदि किसी परिस्थिति में षड्बल विपरीत होता है तो उस अवस्था में ग्रह दुर्बल हो जाता है और इस कारण वो ग्रह अपना पूर्ण रूप से फल देने में असमर्थ सिद्ध होता है।
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ग्रहों का बल
षड्बल में ग्रहों के छह प्रकार के बलों का गणित निकाला जाता है। चलिए इस बारे में अब विस्तारपूर्वक जानते हैं:-
स्थान बल :
स्थान बल अथवा स्थानीय बल जातक को ग्रह शक्ति प्रदान करता है। यह वो बल है जो किसी भी ग्रह को जातक की जन्म कुंडली में एक विशेष तरह की शुभ स्थिति में आने पर प्राप्त होता है। ज्योतिष नियम अनुसार ग्रहों को स्थानीय बल तभी प्राप्त होता है जब वह अपने मूल त्रिकोण, मित्र राशि, स्वराशि, उच्च राशि या फिर ग्रह षडवर्ग में अपनी ही राशि में विद्यमान हो।
दिग बल :
दिगबल से हमारा आशय बल और शक्ति से है। हर ग्रह किसी न किसी विशेष स्थान पर दिग्बली होता है। जैसे सूर्य और मंगल को दिगबल तभी प्राप्त होता है जब वो दशम भाव में होते हैं। जबकि चंद्र और शुक्र जब सुख भाव में होते हैं तब उन्हें दिगबल प्राप्त होता है। इसके अलावा गुरु और बुध जब लग्न की स्थिति में होते हैं, तब उन्हें दिगबल प्राप्त होता है। वहीं शनि जब सप्तम भाव में होता है, तब उसे दिग बल प्राप्त होता है।
काल बल :
जिस बल से शक्ति का निर्धारण होता है, उसे काल बल कहते हैं। ज्योतिष नियमनुसार जो पाप ग्रह होते हैं, वह कृष्ण पक्ष में बलवान होते हैं। जबकि शुभ ग्रह शुक्ल पक्ष में बलवान होते हैं। इसके अलावा चंद्र, मंगल और शनि रात्रि के पहर में बली होते हैं अर्थात इनका जन्म कुंडली के रात्रि पहर में बली होता है। सूर्य, शुक्र और गुरु दिन बली हैं। बुध ग्रह रात और दिन दोनों पहरों में बली होते हैं।
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चेष्टा बल :
चेष्टा बल गतिशील बल को कहते हैं। नियमनुसार मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि को चेष्टा बल तभी प्राप्त होता है, जब वो वक्री अवस्था में होते हैं। वहीं सूर्य और चंद्रमा को चेष्टा बल की प्राप्ति तभी होती है जब सूर्य मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृषभ अथवा मिथुन में हो अर्थात उत्तरायण में हो।
नैसर्गिक बल :
यह बल प्राकृतिक बल प्रदान करने वाला है। मान्यता है कि समस्त ग्रहों में से जहां सूर्य सर्वाधिक बली होता है, वहीं शनि सबसे कम बली होता है। इसके अलावा नियम यह कहता है कि सूर्य, चंद्रमा, शुक्र, गुरु, बुध, मंगल और शनि अपने क्रम के अनुसार ही अधिक व कम बली होते हैं।
दृष्टि बल :
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार दृष्टि बल वो बल है जो शुभ ग्रह की दृष्टि से जहाँ बढ़ता है तो वहीं, पाप ग्रह की दृष्टि से ये बल घटता जाता है।
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षड्बल निकालने के क्या लाभ हैं ?
हम आपको बता दें कि षड्बल के आधार पर घटनाओं के घटने की भविष्यवाणियां सटीक की जा सकती है और इनमें दृढता बढ़ती है। षड्बल के आधार पर जो भविष्यवाणियां की जाती हैं, उनमें त्रुटियों की संभावना अपेक्षाकृत कम हो जाती है। जब ग्रहों के बल का आकलन किया जाता है, उसके बाद हमे ये तय करने में मुश्किल नहीं होती कि जातक की कुंडली का विश्लेषण करने के लिए लग्न, चंद्रमा तथा सूर्य में से आधार किस ग्रह को बनाया जाए। नियम ये कहता है कि फलित के मामले में इन तीनों में से जो बली हो, उसे ही फलित के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। पिंडायु अथवा अंशायु विधि से जातक की सटीक आयु की गणना करना आसान हो जाता है। इस विधि से आयु गणना के लिए जिन आंकड़ों की जरुरत होती है, वो मिल जाते हैं। अंतर्दशा और महादशा के आधार पर फलित करना आसान हो जाता है। क्योंकि जो ग्रह षड्बल में बली होते हैं, वो दशा-अंतर्दशा में फलदायक होते हैं। ये अलग बात है कि ये फल शुभ अथवा अशुभ भी हो सकते हैं।
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ग्रहों की अवस्था
जिस तरह से इस संसार में मानव अपने जीवन में अलग-अलग अवस्थाओं से गुजरता है, जिसमें बाल, किशोर, युवा एवं वृद्ध अवस्थाएं शामिल हैं, ठीक उसी प्रकार से ज्योतिष शास्त्र में भी ग्रहों की बाल, किशोर, युवा एवं वृद्ध अवस्थाएं होती हैं। ग्रहों की ये अवस्थाएं जातक के जन्म कुंडली फलित को ठीक उसी प्रकार से प्रभावित करती हैं, जिस प्रकार से मनुष्य की अलग-अलग अवस्थाएं उसके जीवन को प्रभावित करती हैं। जिस तरह से मानव अपनी किशोर व युवा अवस्था में मजबूत, सशक्त व बलवान होता है। ठीक उसी प्रकार से ग्रह भी अपनी युवा व किशोरावस्था में अधिक मजबूत, सशक्त और बलवान होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर जातक की जन्म कुंडली में कोई ग्रह शुभ बलशाली होता है, तो वह जातक के लिए शुभ फलदायक होगा और अगर शुभ ग्रह कमजोर व दुर्बल हुआ तो वह अपने शुभ फल प्रदान नहीं कर पाएगा। यही वजह है कि कुंडली में शुभ ग्रहों की बलवान व मजबूत होना अत्यंत आवश्यक होता है। मानव जीवन की विभिन्न अवस्थाएं उसकी उम्र के अनुसार तय होती है, जबकि ग्रहों की अवस्थाएं उनके अंशों के अनुसार। ज्योतिष विज्ञान में सभी ग्रह 30 अंश के माने गए हैं।
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दोस्तों आज के लिए इतना ही। अगले लेख में ‘Chapter 2- षड्बल : ग्रह अंश व उनकी अवस्थाओं” के बारे में विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगे और जानें कि आखिर ग्रहों की किस अवस्था में कितने अंश होते हैं। तब तक के लिए आपका धन्यवाद!
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