सुख-दुःख अतिथि हैं, बारी-बारी आएंगे और चले जाएंगे, पढ़ें इससे जुड़ी 5 बड़ी सीख

संसार में शायद ही कोई ऐसा हो जिसके जीवन में कभी दु:ख न आया हो. आदमी छोटा हो या बड़ा, धनी हो या फिर निर्जन, ताकतवर हो या फिर कमजोर, हर व्यक्ति को कभी न कभी किसी बात का दु:ख जरूर होता है. यह दु:ख जब किसी के जीवन में आता है तो कुछ लोग उसका सामना करते हुए जल्द ही उबर जाते हैं तो वहीं कुछ इस दु:ख के आते ही उसकी चिंता में घुलने लग जाते हैं.

दु:ख के आने पर न सिर्फ व्यक्ति की परीक्षा होती है, बल्कि इसके आते ही आपको अपने और पराए का भी पता लग जाता है. एक बार दुख ने सुख से कहा कि तुम बहुत भाग्यशाली हो, लोग तुम्हे ही पाना चाहते हैं. तब सुख ने कहा भाग्यशाली मैं नहीं बल्कि तुम हो क्योंकि तुम्हारे आते ही लोग अपनों को याद करने लग जाते हैं तो वही जैसे मैं किसी के जीवन में प्रवेश करता हूं तो लोग अपनों को भूल जाते हैं. आइए दु:ख के असल मायने समझने के लिए पढ़त हैं सफलता के मंत्र.

इंसान के जीवन में दो तरह के दुःख होते हैं पहला वह जिसकी अभिलाषा पूरी नहीं हुई और दूसरा यह कि उसके जीवन की अभिलाषा पूरी हो गई.
चिंता जीवन के सारे दुखों का एक ही कारण है. ऐसे में किसी भी प्रकार का कष्ट आने पर सबसे पहले उससे जुड़ी चिंता करना छोड़ दें, बल्कि उसे दूर करने का चिंतन करें.
अगर थोड़े से आराम को छोड़ने से व्यक्ति को बड़ी खुशी मिलती है तो एक समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह थोड़ा सा दु:ख या कष्ट सहते हुए बड़ा सुख हासिल करे.
दुख किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, वह हर किसी के जीवन में आता है. इसलिए दुखी होने की बजाय उससे बाहर निकलने का प्रयास करना ही समझदारी होती है.
इंसान का जीवन एक सिक्के के समान है, जिसके एक ओर सुख तो दूसरी ओर दु:ख होता है. उसके साथ कभी सुख तो कभी दुःख लगा रहता है. ऐसे में जब सुख हो तो घमंड मत करना और जब दुःख आए तो थोड़ा सब्र करना.

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