कालसर्प दोष सहित इन सभी दोषों से मुक्ति दिलाती है आषाढ़ अमावस्या; सिर्फ एक उपाय से दूर होगी हर समस्या!

सनातन धर्म में पूजा पाठ के लिए आषाढ़ माह को बेहद ही शुभ और महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस महीने में आने वाली अमावस्या को आषाढ़ अमावस्या या हलहारिणी अमावस्या भी कहते हैं। चंद्र मास के अनुसार आषाढ़ वर्ष का चौथा महीना होता है और इसके बाद वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। आषाढ़ अमावस्या पितरों के तर्पण के लिए ही नहीं अपितु किसानों के लिए भी है बेहद ख़ास मानी जाती है। इस दिन नदी में स्नान करके पितरों की पूजा करनी चाहिए। इसके अलावा हल और खेतों में उपयोग होने वाले उपकरणों का भी पूजा की जाती है। अमावस्या तिथि पितृदोष और कालसर्प दोष को दूर करने के लिए काफी शुभ मानी जाती है। इस दिन यदि कुछ उपायों को अमल में लाया जाए तो जीवन से कई सारी परेशानियों से छुटकारा पाया जा सकता है और व्यक्ति का जीवन खुशहाल बन सकता है। तो आइए बिना देरी किए आगे बढ़ते हैं और जानते हैं आषाढ़ अमावस्या के दिन किए जाने वाले उपाय, व्रत की तिथि, पूजा मुहूर्त, महत्व और पौराणिक कथा के बारे में।

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आषाढ़ अमावस्या: तिथि व मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को आषाढ़ अमावस्या मनाई जाती है। इस वर्ष आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 18 जून 2023 को पड़ेगी। आषाढ़ अमावस्या का आरंभ 17 जून 2023 शनिवार की सुबह 09 बजकर 13 मिनट से होगा जबकि समापन अगले दिन 18 जून की सुबह 10 बजकर 8 मिनट पर होगा।

आषाढ़ अमावस्या का महत्व

आषाढ़ अमावस्या के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करके सूर्य भगवान को जल देने का बहुत महत्व है। यह अमावस्या दान-पुण्य व पितरों की आत्मा की शांति के लिये किये जाने वाले धार्मिक कार्यों के लिए विशेष फलदायी मानी गई है। इसके अलावा इस दिन यज्ञ करने से कई गुना फल प्राप्त होता है। इस दिन व्यक्ति को पितरों की शांति के लिए गरीबों की सेवा करनी चाहिए और जरूरतमंदों को खाना-खिलाने साथ ही दान भी देना चाहिए। इसके अलावा माना जाता है कि इस दिन किसी भी शुभ काम की शुरुआत की जा सकती है।

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आषाढ़ अमावस्या पर इस तरह से करें पूजा

आषाढ़ अमावस्या के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान व ध्यान करें और यदि व्रत रख रहे हैं तो व्रत का संकल्प लें।इस दिन पवित्र नदियों व सरोवर में स्नान व दान करने का विशेष महत्व है।यदि नदी व तालाब में स्नान करना संभव न हो तो आप घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। इसके बाद पूजा, जप-तप करना चाहिए और सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए। इस दिन शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक लगाएं और अपने पितरों को स्मरण करें। इसके साथ ही, सात बार पीपल के पेड़ की परिक्रमा करें।

आषाढ़ अमावस्या की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, स्वर्ग धाम की नगरी अलकापुरी में कुबेर नाम के एक राजा रहते थे। वे शिव जी के बड़े भक्त थे और प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा में लीन रहते थे। वहीं राजा का माली हेम रोजाना पूजा के लिए फूल लाया करता था। हेम माली की एक सुंदर पत्नी थी। उसका नाम विशालाक्षी था। एक दिन माली मानसरोवर से फूल लेकर आया लेकिन अपनी पत्नी से मजाक करने लगा। राजा दोपहर तक माली की प्रतीक्षा करते रहें। कुछ देर बाद राजा ने अपने सेवकों को माली का पता लगाने के लिए आदेश दिया। सिपाहियों ने राजा से कहा ‘महाराज माली बड़ा पापी और आक्रामक है। वह अपनी महिला के साथ मजाक कर रहा है।’ यह सुनकर राजा क्रोधित हो गया और माली को महल बुलाने का आदेश दिया। हेम माली यह बात सुनकर डर से कांपने लगा। राजा कुबेर ने क्रोधित होकर माली को डांटा और कहा कि तुमने भगवान शिव का अपमान किया इसलिए वह स्त्री वियोग सहेगा और मृत्युलोक जाकर कोढ़ी बनेगा।

राजा कुबेर के श्राप के कारण हेम माली देवलोक से गिरकर पृथ्वी पर आ गया। हेम माली की पत्नी अंतर्ध्यान हो गयी। पृथ्वी पर आकर माली को बड़ा कष्ट हुआ। वह बिना भोजन और पानी के जंगल में भटकता रहा। हेम माली काफी परेशान रहने लगा, उसकी रातों की नींद उड़ गई लेकिन भगवान शिव की आराधना के प्रभाव से उसे अपने पूर्व जन्म में की गई गलतियां याद आ गई। एक दिन माली घूमते-घूमते मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँचा। उसे वह आश्रम ब्रह्मा की सभा जैसा दिखने लगा। हेम माली वहां गया और ऋषि के चरणों में गिर पड़ा। यह देखकर ऋषि ने माली की इस हाल की वजह पूछी। हेम माली ने ऋषि को सारी बात बताई। ऋषि ने उसे एक व्रत के बारे में बताया और कहा कि इस व्रत को रखने से उसका उद्धार होगा।

ऋषि जी ने कहा कि यदि योगिनी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का व्रत करें तो उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह सुनकर माली ने ऋषि जी को प्रणाम किया और नियामनुसार व्रत करने लगा। व्रत के प्रभाव से माली से सारी दुख कष्ट नष्ट हो गए और वह फिर से अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। 

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आषाढ़ अमावस्या के दिन जरूर करें ये ख़ास उपाय

पितरों और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए

आषाढ़ अमावस्या से वर्षा ऋतु की शुरुआत हो जाती है इसलिए इस दिन पीपल, बड़, नीम, आंवला, अशोक, तुलसी, बिल्वपत्र और अन्य पेड़-पौधे लगाने से पितर और देवता प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

पापों से मुक्ति पाने के लिए

इस दिन काली चींटियों को चीनी या गुड़ मिला हुआ आटा खिलाएं। इसके अलावा तालाब या नदी में मछलियों के लिए आटे की गोलियां बनाकर डालना चाहिए। माना जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति के सारे दुख कट जाते हैं और पापों से मुक्ति मिल जाती है।

ग्रह दोषों से छुटकारा पाने के लिए

अमावस्या पर पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाना चाहिए। इससे ग्रह दोष दूर होते हैं।

मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए

आषाढ़ अमावस्या के दिन शाम के समय घर के ईशान कोण में देशी घी का दीपक लगाएं। इसमें रूई की जगह लाल रंग के धागे की बत्ती बनाकर लगाए और अगर संभव हो तो दीपक में थोड़ा केसर डाल दें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है और व्यक्ति को कभी भी धन की कमी नहीं होती है।

शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति के लिए

अमावस्या के दिन काले कुत्ते को रोटी में सरसों का तेल लगाकर खिलाना शुभ होता है। माना जाता है कि ऐसा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

सुख समृद्धि के लिए

इस अमावस्या के दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान दें व साथ ही भोजन कराएं। ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि बनी रहती है।

तुलसी की माला का जाप करें

इस शुभ दिन तुलसी की माला लेकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ का 108 बार जाप करें। साथ ही, तुलसी का पौधा घर पर जरूर लगाएं। ऐसा करने से व्यक्ति सभी रोगों से छुटकारा पा लेता है।

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