गुरु का मेष राशि में गोचर: जानें देश और दुनिया पर इसका प्रभाव!

गुरु का मेष राशि में गोचर: एस्ट्रोसेज के इस विशेष ब्लॉग में हम आपको गुरु के मेष राशि में गोचर के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान करेंगे। साथ ही, यह भी बताएँगे कि यह देश-दुनिया को कैसे प्रभावित करेगा और इसके नकारात्मक प्रभावों से कैसे बचा जा सकता है लेकिन इससे पहले जान लेते हैं कि इस गोचर तिथि व समय क्या है।

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गुरु का मेष राशि में गोचर: समय व तिथि

देव गुरु बृहस्पति एक राशि से दूसरी राशि में गोचर करने में 13 महीने का वक्त लगाते हैं। यही वजह है कि ज्योतिष में गुरु का गोचर, शनि के गोचर के बाद सबसे बड़ी घटनाओं में से एक माना जाता है और इसका प्रभाव मानव जीवन और देश-दुनिया पर काफ़ी गहरा देखने को मिलता है। इसी क्रम में बृहस्पति देव मंगल की मूल त्रिकोण राशि मेष में गोचर करने जा रहे हैं। बता दें कि मंगल और बृहस्पति मित्र ग्रह हैं और ये दोनों ही ग्रह अग्नि तत्व के प्रतिनिधि हैं इसलिए बृहस्पति मेष राशि में सहज स्थिति में होंगे। इसके परिणामस्वरूप जातक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करने में सक्षम होंगे। बृहस्पति का मेष राशि में गोचर 22 अप्रैल, 2023 की सुबह 3 बजकर 33 मिनट पर होगा। आइए आगे बढ़ते हैं और जानते हैं कि देश-दुनिया पर इसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है।

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ज्योतिष में गुरु ग्रह का महत्व

बृहस्पति सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। वैदिक ज्योतिष में इसे ‘गुरु’ का दर्जा दिया गया है। यह ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्त्री की कुंडली में बृहस्‍पति पति के कारक होते हैं। ये नव ग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माने जाते हैं। धनु और मीन राशि का स्वामित्व इन्हीं को प्राप्त है। कर्क इनकी उच्च राशि है जबकि मकर इनकी नीच राशि मानी जाती है। नक्षत्रों की बात करें तो 27 नक्षत्रों में बृहस्पति को पुनर्वसु, विशाखा, और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का स्वामित्व प्राप्त है। 

यदि कुंडली में बृहस्पति शुभ स्थान पर हैं, तो यह जातक को लाभकारी परिणाम देते हैं और ऐसे व्यक्ति पर बृहस्पति देव की सदैव कृपा बनी रहती है। साथ ही व्यक्ति की समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ती है। बृहस्पति की कृपा से व्यक्ति को सुख-समृद्धि, शांति और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। जबकि कमजोर बृहस्पति के कारण जातक लापरवाह, खर्चीला और उग्र स्वभाव का हो सकता है।

मेष राशि में बृहस्पति का प्रभाव

मेष राशि, राशि चक्र की पहली राशि है और इस राशि में बृहस्पति के प्रभाव से जातक घूमने-फिरने का शौकीन होता है। ऐसे जातक जीवन में नई चीजों का अनुभव करने के लिए उत्सुक रहते हैं और स्वभाव से साहसी होते हैं इसलिए एडवेंचर इन्हें बहुत पसंद होता है। बृहस्पति सौभाग्य और यात्रा के भी प्रतीक हैं। मेष राशि में बृहस्पति के प्रभाव से जातक अच्छी चीजों के प्रति आकर्षित होते हैं। यह प्रभाव उनके उत्साह और इच्छा शक्ति को और अधिक बढ़ाने में मदद करता है। ये अपने किए पर अधिक पछतावा नहीं करते हैं और इन्हें दुनिया काफी आशावादी लगती है। ये अपने आपको पूरी तरह लक्ष्य के प्रति समर्पित कर देते हैं। ख़ास बात यह है कि ये जातक पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में सफलता प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। ये लोग ज्ञानी होते हैं और हर चीज़ के बारे में जानने को लेकर उत्सुक रहते हैं। साथ ही सकारात्मक विचारों वाले होते हैं। नकारात्मक पक्ष की बात करें तो ऐसे जातक स्वभाव से कई बार अहंकारी हो सकते हैं और बिना अपनी क्षमताओं पर विचार करे, काम करने वाले होते हैं जिसके परिणामस्वरूप कई बार इन्हें प्रतिकूल परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं।

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गुरु का मेष राशि में गोचर: वैश्विक प्रभाव

भारत में लोगों का झुकाव धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों की तरफ बढ़ेगा।इस गोचर के दौरान आध्यात्मिक ग्रंथों की खोज में भारत में आने वाले विदेशी टूरिस्ट की संख्या में वृद्धि देखने को मिल सकती है।तेल, घी, दूध और अन्य डेयरी उत्पादों की कीमतों में कमी आ सकती है।पूजा-पाठ में इस्तेमाल की जाने वाली चीजें जैसे अगरबत्ती, फूल आदि चीजों का निर्यात बढ़ सकता है।यह गोचर शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों जैसे काउंसलर, शिक्षक, अनुदेशक, प्रोफेसर के लिए अनुकूल प्रतीत हो रहा है। मंत्री व सरकार में उच्च पदों पर आसीन लोग समाज के हित के बारे में चर्चा करते हुए नज़र आएंगे और लोगों का समर्थन प्राप्त करेंगे।दुनिया भर में स्वास्थ्य से संबंधित क्षेत्रों में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे।इस गोचर के दौरान लेखकों और फिलॉस्फर लोगों को अपने कार्यक्षेत्र में प्रगति देखने को मिल सकती है।यह अवधि विश्व भर के रिसर्चर्स, सरकार के सलाहकार और साइंटिस्ट के लिए फलदायी साबित होगी।

गुरु का मेष राशि में गोचर: सामान्य उपाय

बृहस्पति के बीज मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जप करें।भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें पीली मिठाई का भोग लगाएं।ज्यादा से ज्यादा पीले रंग के वस्त्र पहनें और कुंडली में बृहस्पति की स्थिति के आधार पर पीला नीलम धारण करें।दान-पुण्य करें और गरीबों व जरूरतमंदों की सेवा करें।हर गुरुवार को पीपल के वृक्ष की पूजा करें।गुरु यंत्र की स्थापना करें और विधि-विधान से उसकी पूजा करें।

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