देवी के इस मंदिर का रहस्य, जहां आज भी 800 सालों से पहली पूजा करता आ रहा है यह वीर योद्धा

22 मार्च से देवी दुर्गा और शक्ति की आराधना का महापर्व चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri 2023) शुरू हो गए हैं. नवरात्रि पर नौ दिन तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती हैं. नवरात्रि के पावन पर्व पर मां दुर्गा के सभी शक्तिपीठों और मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ होती है. देश में मां शक्ति की साधना और उपासना के लिए कई शक्तिपीठ है. सभी शक्तिपीठों में मां से जुड़े कई तरह के रहस्य जुड़े हुए हैं.

ऐसा ही शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर में स्थिति है जहां पर 600 फीट की ऊंचाई पर हरी-भरी त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित माँ दुर्गा के शारदीय स्वरूप देवी मां शारदा का अद्भुत व चमत्कारी मंदिर है जो मैहर देवी शक्तिपीठ के नाम से विख्यात है.

मैहर का अर्थ है-‘मां का हार’. मान्यता है कि इस मंदिर में श्रद्धा भक्ति से ढोक लगाने वाले प्रत्येक श्रद्धालु जन की मनोकामना मां शारदा अवश्य पूरी करती हैं,उनके कष्ट-क्लेशों को दूर करती हैं. यहां प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में चैत्र और शारदीय नवरात्रि पर यहां मेला लगता है. जिसमें लाखों यात्री मैहर आते हैं. इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ श्री कालभैरव, हनुमान जी, काली मां, श्री शिव गौरी, शेषनाग, फूलमती माता, ब्रह्मदेव और जलापा देवी की पूजा की जाती है. यहां भगवान नृसिंह की प्राचीन मूर्ति विराजमान है.

मैहर शक्तिपीठ से जुड़ी है दो भाईयों की कथा

लोगों की मान्यताओं के अनुसार आज से सैकड़ों वर्ष पहले अल्हा और उदल दो भाई थे और ये दोनों ही महान योद्धा थे. इन दोनों भाईयों ने पृथ्वीराज चौहान के साथ कई बार युद्ध किया था. युद्ध के दौरान ये जंगलों में अक्सर भटकते रहते थे. दोनों भाई जंगल में भटकने के दौरान एक माता का मंदिर उन्हें मिला. माता के मंदिर में विराजमान को देखते है दोनों के मन में भक्ति और वैराग्य आ गया. समय के बीतने के साथ ये दोनों भाई माता की भक्ति में डूबने लगे. ऐसी मान्यता है कि अल्हा ने 12 सालों तक देवी को प्रसन्न करने के लिए इसी जगह कठोर तप किया था.

ऐसी मान्यता है कि अल्हा की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अपना आशीर्वाद दिया था. अल्हा देवी माता की पूजा करने के दौरान उन्हें शारदा माई कहकर बुलाता था. तब इस मंदिर का नाम मैहर वाली शारदा के नाम से प्रसिद्धि हो गया. इस मंदिर के बारे में यह मान्यता है कि आज भी सबसे पहले माता शारदा के दर्शन और उनकी पूजा आल्हा की करते हैं. शारदा मां इस मंदिर को हर रात 2 बजे से लेकर सुबह 5 बजे तक बंद कर दिया जाता है. इस समय के दौरान मंदिर के गर्भगृह और इसके आसपास किसी के भी रहने की इजाजत नहीं होती है.

ऐसा माना जाता है करीब 800 सालो से हर रोज अल्हा और उदल दोनों भाई माता के दर्शन और उनका पूजन करते हैं. ऐसा कहा जाता है कि जब सुबह मंदिर के पट खोले जाते हैं तो हर रोज माता का श्रृंगार और ताजे फूल चढ़े हुए मिलते हैं. इस शक्तिपीठ मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब और अखाड़ा मिलता है जहां पर कहा जाता है अल्हा और उदल दोनों ही भाई यहां पर कुश्ती करते थे.

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