नवरात्रि पहला दिन: जानें घटस्थापना के नियम, विधि, मंत्र एवं माँ शैलपुत्री को प्रसन्न करने के राशि अनुसार उपाय!

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष (विक्रम संवत 2080) की शुरुआत होगी। ब्रह्म पुराण के अनुसार, ब्रह्मा जी ने इसी तिथि को सृष्टि की रचना की थी तथा सतयुग का आरंभ भी इसी तिथि से माना गया है। एक अन्य मान्यता के मुताबिक, श्री हरि भगवान विष्णु ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही मत्स्य अवतार लिया था। हिन्दू नववर्ष के आरंभ होने के साथ ही चैत्र नवरात्रि 2023 का पहला दिन शुरू होगा।

बता दें कि चैत्र नवरात्रि 2023 की शुरुआत 22 मार्च 2023 से हो रही है और इसका समापन 31 मार्च 2023 को यानी कि दशमी तिथि को चैत्र नवरात्रि पारणा के साथ होगा। नवरात्रि शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है नौ रातें। भारत के कई राज्यों में इसे गुड़ी पड़वा के नाम भी जाना जाता है। इसमें 9 दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि विधान से पूजा की जाती है, जिनमें से प्रथम दिन माँ शैलपुत्री को समर्पित है। शैलपुत्री संस्कृत भाषा का एक शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है पर्वत की बेटी। शैल यानी कि पर्वत और पुत्री यानी कि बेटी। इस दिन घटस्थापना (कलश स्थापना) भी की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, यदि घटस्थापना शुभ मुहूर्त में न किया जाए तो माता रानी नाराज़ हो जाती हैं। तो आइए विस्तारपूर्वक जानते हैं कि घटस्थापना का क्या महत्व है। नवरात्रि के पहले दिन श्रद्धालुओं को किस पूजा विधि का पालन करना चाहिए और क्या-क्या उपाय करने चाहिए।

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घटस्थापना: महत्व एवं शुभ मुहूर्त

हम जानते हैं कि हिन्दू धर्म में किसी भी पूजा या शुभ कार्यक्रम की शुरुआत करने से पहले भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि यानी कि पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हमारे धर्म में कलश को भगवान गणेश की संज्ञा दी गई है। मान्यता है कि यदि घटस्थापना शुभ मुहूर्त में और विधिवत न की जाए तो माता रानी नाराज़ हो जाती हैं, इसलिए शुभ मुहूर्त और सही विधि का पता होना बहुत ज़रूरी है।

घटस्थापना मुहूर्त: 22 मार्च 2023 को 06:23 से 07:32 तक

अवधि: 1 घंटे 08 मिनट

घटस्थापना के नियम

घटस्थापना के लिए दिन के पहले एक तिहाई समय को सबसे उत्तम माना जाता है।कोई अन्य स्थिति होने पर आप अभिजीत मुहूर्त में घटस्थापना कर सकते हैं।मान्यताओं के अनुसार, कलश स्थापना किचित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के दौरान नहीं करना चाहिए। हालांकि यह समय पूर्ण रूप से वर्जित नहीं है।कलश स्थापना दिन के मध्य काल से पहले हर हाल में कर लेनी चाहिए।चैत्र नवरात्रि के पहले दिन की सुबह द्विस्वभाव लग्न मीन होता है और इस अवधि में कलश स्थापना करना शुभ माना गया है।घटस्थापना के लिए कुछ नक्षत्र बेहद शुभ होते हैं, जो कि पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, हस्ता, रेवती, रोहिणी, अश्विनी, मूल, श्रवण, धनिष्ठा और पुनर्वसु आदि हैं।

घटस्थापना के लिए आवश्यक सामग्री

चौड़े मुंह वाला मिट्टी का बर्तनपवित्र जगह की मिट्टीसप्तधान्य (7 प्रकार के अनाज)कलशगंगाजलकलावा/मौलीसुपारीआम या अशोक के पत्ते (पल्लव)अक्षत जटाओं वाला नारियललाल रंग का कपड़ाफूलमालामिठाईदूर्वा (दूब घास)सिंदूर

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घटस्थापना की विधि

सबसे पहले चौड़े मुंह वाले मिट्टी के बर्तन में पवित्र स्थान वाली मिट्टी भरें और फिर उसमें सप्तधान्य बो दें।उसके ऊपर कलश रखकर उसमें जल भर दें।फिर कलश के ऊपरी भाग यानी कि सिरे पर कलावा बांध दें।इसके बाद कलश के ऊपर आम या अशोक के पल्लव रख दें।फिर जटाओं वाले नारियल को लाल कपड़े में बांधकर कलश के ऊपर और पल्लव के बीच में रख दें।ध्यान रहे कि लाल कपड़े में बंधे हुए नारियल में कलावा लिपटा होना चाहिए।इस प्रकार घटस्थापना करने के बाद माता रानी के आह्वान करें।

व्रत संकल्प मंत्र

जो श्रद्धालु पूरे 9 दिनों तक व्रत करते हैं, उन्हें नीचे दिए गए मंत्र के साथ व्रत संकल्प लेना चाहिए।

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे चैत्रशुक्लप्रतिपदि अमुकवासरे प्रारभमाणे नवरात्रपर्वणि एतासु नवतिथिषु अखिलपापक्षयपूर्वक-श्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये संयमादिनियमान् दृढ़ं पालयन् अमुकगोत्रः अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः प्रसादाय व्रतं विधास्ये।

नोट: मंत्रोच्चारण शुद्ध एवं स्पष्ट होना चाहिए। इस मंत्र में कई जगह अमुक शब्द आया है। जैसे- अमुकनामसम्वत्सरे, यहाँ पर आप अमुक की जगह संवत्सर का नाम उच्चारित करेंगे। यदि संवत्सर का नाम सौम्या है तो इसका उच्चारण सौम्यनामसम्वत्सरे होगा। ठीक ऐसे ही अमुकवासरे में उस दिन का नाम, अमुकगोत्रः में अपने गोत्र का नाम और अमुकनामाहं में अपना नाम उच्चारित करें।

यदि आप पहले, दूसरे और तीसरे दिनों के लिए उपवास रखने वाले हैं, तो ऐसी स्थिति में ‘एतासु नवतिथिषु’ की जगह उस तिथि के नाम के साथ संकल्प किया जाएगा जिस तिथि को उपवास रखा जा रहा है। जैसे – यदि सातवें दिन का संकल्प करना है, तो मंत्र इस प्रकार होगा:

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे चैत्रशुक्लप्रतिपदि अमुकवासरे प्रारभमाणे नवरात्रपर्वणि सप्तम्यां तिथौ अखिलपापक्षयपूर्वक-श्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये संयमादिनियमान् दृढ़ं पालयन् अमुकगोत्रः अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः प्रसादाय व्रतं विधास्ये।

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षोडशोपचार पूजन संकल्प मंत्र

यदि आप नवरात्रि के दौरान षोडशोपचार पूजन करने की योजना बना रहे हैं तो नीचे दिए गए मंत्र से प्रतिदिन पूजा संकल्प लें।

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे चैत्रशुक्लप्रतिपदि अमुकवासरे नवरात्रपर्वणि अखिलपापक्षयपूर्वकश्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये अमुकगोत्रः अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः षोडशोपचार-पूजनं विधास्ये।

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माँ शैलपुत्री का रूप एवं पौराणिक कथा

माता शैलपुत्री के माथे पर अर्धचंद्र होता है। देवी शैलपुत्री दाएं हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल का पुष्प लिए रहती हैं। इनकी सवारी वृष यानी कि नंदी बैल है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता शैलपुत्री अपने पिछले जन्म में दक्ष की पुत्री थीं तथा भगवान शिव की पत्नी थीं। एक बार दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवताओं को आमंत्रित किया था मगर भगवान शिव को नहीं किया। माता शैलपुत्री भी उस महायज्ञ में जाने के लिए व्याकुल हो रही थीं। इस पर भगवान शिव ने उनसे कहा कि उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया है, इसलिए उनका जाना कहीं से भी उचित नहीं है। माता रानी जब हद से ज़्यादा निवेदन करने लगीं तो भगवान शिव ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी।

जब माता अपने घर पहुँचीं तो उन्होंने वहां अपने पति के प्रति तिरस्कार का भाव देखा तथा दक्ष ने भी उनके लिए कई अपमानजनक शब्द कहे। यह सब देखकर माँ शैलपुत्री ने खुद को योगाग्नि द्वारा भस्म कर लिया। इस पर भगवान शिव क्रोध से भर गए और उन्होंने उस यज्ञ को विध्वंस कर दिया। फिर अगले जन्म में भगवान शिव की इन्हीं सती ने शैलराज हिमालय के राजा हिमावत के घर में जन्म लिया। इसी कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। इन्हें हेमवती के नाम से भी जाना जाता है तथा वृष यानी कि बैल की सवारी करने के कारण इनका अन्य नाम वृषारूढ़ा भी है।

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नवरात्रि पहला दिन: माँ शैलपुत्री की पूजा का महत्व, भोग एवं मंत्र

मान्यताओं के अनुसार, माँ शैलपुत्री की विधि विधान से पूजा करने पर श्रद्धालुओं को तमाम प्रकार के सुख, सुखद वैवाहिक जीवन आदि की प्राप्ति होती है। साथ ही उनके विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं तथा हर मनोकामना पूर्ण होती है।

माँ शैलपुत्री भोग

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता शैलपुत्री को भोग में गाय का घी और गाय के घी से बनी चीज़ें अर्पित करनी चाहिए। इन चीज़ों के अर्पण से माता रानी प्रसन्न होती हैं तथा अपने भक्तों को आरोग्य और सुखी जीवन का आशीर्वाद देती हैं।

माँ शैलपुत्री उपासना मंत्र

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

स्तुति मंत्र: या देवी सर्वभू‍तेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

ज्योतिषीय दृष्टि से माँ शैलपुत्री

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, माँ शैलपुत्री चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी कारण मान्यता है कि इनकी पूजा-अर्चना करने से कुंडली में चंद्रमा बलवान होता है तथा चंद्रमा के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है।

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नवरात्रि पहला दिन: राशि अनुसार अचूक उपाय

मेष: 

सुगंधित अगरबत्ती जलाएं तथा गाय के घी का दीपक जलाएं।ग़रीब एवं ज़रूरतमंद लोगों को गेहूं और चावल दान करें।पारिवारिक जीवन में सुख-शांति लाने के लिए इस दिन भगवान शिव की पूजा करें।

वृषभ:

ग़रीब लोगों या फिर किसी मंदिर में सफेद वस्तुओं जैसे कि चीनी, दूध, दही आदि का दान करें।“ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः” का जाप करें।

मिथुन:

माँ शैलपुत्री एवं प्रथम पूजनीय भगवान गणेश को दूर्वा (दूब घास) अर्पित करें।प्रसाद के रूप में माँ शैलपुत्री को मोतीचूर के लड्डू चढ़ाएं।

कर्क:

माँ शैलपुत्री को चंद्रमा का स्वामित्व प्राप्त है, इसलिए कर्क राशि के जातकों को इस दिन चंद्र देव की पूजा करनी चाहिए। साथ ही “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः” का जाप करें।इस दिन मेडिटेशन करें क्योंकि माँ शैलपुत्री मूलधारा चक्र पर शासन करती हैं, जो कि पारिवारिक जीवन में सकारात्मकता और संतुलन लाने के लिए मददगार साबित होगा।

सिंह:

किसी बर्तन में पानी भरकर, उसमें गुलाब की पंखुड़ियां, तांबे का सिक्का या तांबे का टुकड़ा डालकर सूर्य देव को अर्पित करें।गुड़ से बनी चीज़ों का भोग लगाएं।

कन्या:

धार्मिक स्थलों पर गौ दान करें या फिर गाय को हरा चारा या केला खिलाएं।माँ शैलपुत्री को फलों का भोग लगाएं।

तुला:

माँ शैलपुत्री को इत्र या सुगंधित अगरबत्ती अर्पित करें।माँ शैलपुत्री कवच का पाठ करें।

वृश्चिक: 

जल तत्व तथा चंद्रमा की नीच राशि होने के कारण आपको इस दिन योग और मेडिटेशन करना चाहिए। ऐसे करने से आसपास की नकारात्मकता दूर होती है।माता शैलपुत्री को लाल या नारंगी रंग के फूल अर्पित करें।

धनु:

दूध से बनी मिठाई बनाएं तथा गाय के घी का दीपक जलाएं।माँ शैलपुत्री स्तोत्र का पाठ करें।

मकर:

दुर्गा आरती एवं माँ शैलपुत्री आरती का पाठ करें।ग़रीब एवं ज़रूरतमंद लोगों को कपड़े या अन्य ज़रूरी चीज़ें दान करें।

कुंभ:

ग़रीब एवं ज़रूरतमंद लोगों को खीर, पूड़ी खिलाएं।आलस्य न करें तथा अपने आसपास के वातावरण को साफ एवं सकारात्मक रखें।

मीन:

माँ शैलपुत्री को गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाएं तथा शुद्ध देशी घी का दीपक जलाएं।माँ शैलपुत्री के स्तुति मंत्र “या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता” का जाप करें।

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