नौकरी में सफलता- दुश्मनों पर जीत- सब दिलाएँगी माँ कालरात्रि, बस कर लें ये छोटा सा उपाय !

आप सभी को चैत्र नवरात्रि की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। अपने इस नवरात्रि विशेष ब्लॉग की कड़ी  में हम आ पहुंचे हैं नवरात्रि के सातवें दिन के ब्लॉग पर। ऐसे में आज बात करेंगे नवरात्रि के सातवें दिन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में।

साथ ही जानेंगे नवरात्रि के सातवें दिन मां के किस स्वरूप की पूजा की जाती है, मां का स्वरूप कैसा है, मां की पूजा करने से किस तरह के लाभ मिलते हैं, क्या ज्योतिषीय महत्व होता है और क्या कुछ उपाय करके आप इस दिन का महत्व अपने जीवन में बनाए रख सकते हैं।

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मां कालरात्रि का स्वरूप

नवरात्रि के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है जिन्हें देवी पार्वती के समतुल्य माना गया है। देवी के नाम का शाब्दिक अर्थ निकालें तो काल अर्थात मृत्यु या समय और रात्रि का अर्थ होता है रात। ऐसे में मां के नाम का अर्थ होता है अंधेरे को खत्म करने वाली देवी। बात करें मां के स्वरूप की तो देवी कालरात्रि का वर्ण कृष्ण के वर्ण के समान है। यह गधे की सवारी करती हैं। देवी की चार भुजाएं होती हैं जिसमें से दोनों दाहिने हाथ में उन्होंने अभय मुद्रा और वरद मुद्रा में धारण किए हुए हैं जबकि बाएँ दोनों हाथ में उन्होंने तलवार और खड़ग लिया हुआ है।

मां कालरात्रि की पूजा का ज्योतिषीय संदर्भ

मां कालरात्रि की पूजा से मिलने वाले ज्योतिषीय महत्व की बात करें तो कहा जाता है देवी कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं। ऐसे में अगर देवी कालरात्रि की नियमित रूप से और विधिपूर्वक पूजा की जाए तो व्यक्ति के जीवन से शनि के बुरे प्रभाव कम होने लगते हैं।

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मां कालरात्रि की पूजा महत्व 

मां कालरात्रि की पूजा से मिलने वाले लाभ की बात करें तो मां कालरात्रि को दोषों का विनाश करने वाली देवी माना जाता है। इसके साथ ही जो लोग मां की भक्ति पूर्वक पूजा पाठ करते हैं उन्हें माता हमेशा शुभ फल प्रदान करती हैं। यही वजह है की मां का एक नाम शुभंकारी भी है। मां कालरात्रि की पूजा करने से व्यक्ति को भय और रोग से छुटकारा मिलता है। इसके साथ ही भूत, प्रेत, अकाल मृत्यु, रोग, शोक, इस तरह की परेशानियां भी व्यक्ति के जीवन से समाप्त होने लगती है। मां का यह रूप भय उत्पन्न करने वाला है हालांकि केवल पापियों के लिए। यह पापियों का नाश करती हैं। माता के तीन बड़े-बड़े नेत्र हैं जिससे माँ अपने भक्तों पर हमेशा अनुकंपा की दृष्टि बनाए रखती है।

कहा जाता है की मां दुर्गा का कालरात्रि स्वरूप शुभ निशुंभ और रक्तबीज को करने के लिए लिया गया स्वरूप है और देवी कालरात्रि का शरीर अंधकार की तरह है। उनके श्वास से अग्नि निकलती है और गले में विद्युत की चमक वाली माला होती है। मां के केश बड़े-बड़े और बिखरे हुए होते हैं।

मां कालरात्रि को अवश्य लगाएँ ये भोग 

अब बात कर लें माँ कालरात्रि के प्रिय भोग की तो माँ कालरात्रि को गुड़ बहुत प्रिय होता है। ऐसे में नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा में आप माता रानी को फल, मेवे आदि अर्पित करने के साथ गुड़ का भोग अवश्य लगाएँ।

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देवी कालरात्रि का पूजा मंत्र

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥

प्रार्थना मंत्र

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नवरात्रि के सातवें दिन अवश्य करें ये अचूक उपाय

जो कोई भी भक्त नवरात्रि के सातवें दिन माँ कालरात्रि के बीज मंत्र का जाप करता है, रात्रि जागरण करता है और दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है ऐसे व्यक्ति के जीवन से सभी नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और जीवन में सुख समृद्धि बनी रहती है। इस मंत्र का सवा लाख बार जाप करना होता है। कहा जाता है तभी यह मंत्र सिद्ध होता है और व्यक्ति की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है। नवरात्रि की सप्तमी तिथि के दिन माँ कालरात्रि को पेठे का भोग अवश्य लगाएँ और मुमकिन हो तो पेठे की बाली भी अवश्य दें। इससे व्यक्ति को बल और विजय की प्राप्ति होती है। साथ ही अगर आपका कोई कानूनी मामला फंसा हुआ है तो इसमें भी आपको विजय मिलती है। अगर आपके जीवन में नकारात्मक शक्तियां बनी हुई है या घर में छोटे बच्चे हैं जिनको आए दिन नजर लगती रहती है तो नवरात्रि के सातवें दिन उन्हें ताबीज पहना दें। इसके लिए आप एक काले कपड़े में पीली सरसों ले लें, टूटी हुई सूई डालकर कपड़े में लपेट दें और इस ताबीज को बच्चों के गले में पहना दें। कहा जाता है इससे बच्चों को बुरी नजर नहीं लगती और जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।देवी के 32 नाम का जाप विशेष फलदाई माना जाता है। ऐसे में सप्तमी तिथि के दिन जो कोई भी भक्त रात में मां के 32 नाम का 108 बार जाप करता है उनके जीवन से सभी परेशानियां दूर होती है और उन्हें रोग और शोक से भी मुक्ति मिलती है। नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर देवी को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि अगर सप्तमी तिथि के दिन माँ कालरात्रि को आप उड़द दाल की खिचड़ी बनाकर भोग लगा दें और इस पूजा के बाद प्रसाद के रूप में लोगों को बाँट देते हैं तो इससे माँ की कृपा आपके जीवन में बनी रहती है। साथ ही तमाम ग्रहों का प्रतिकूल प्रभाव भी आपके जीवन से दूर होने लगता है। मां कालरात्रि को गुड़हल का फूल बहुत पसंद होता है। ऐसे में नवरात्रि में गुड़हल के फूल को पूजा में अवश्य शामिल करें और सप्तमी तिथि पर पूजा के दौरान मां को लाल गुड़हल की माला पहना दें। ऐसा करने से भी व्यक्ति के सभी मनोकामनाएं पूरी अवश्य होती है। 

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क्या यह जानते हैं आप? 

देवी कालरात्रि दोषों का विनाश करने वाली होती है। मां के स्मरण मात्र से दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, पिशाच, भयभीत होते हैं। इसके अलावा देवी को ग्रह बाधाओं को दूर करने वाली देवी भी माना जाता है। देवी कालरात्रि की पूजा कर ली जाए तो व्यक्ति को अग्नि, जल, जंतु शत्रु, रात्रि, इन सभी से संबंधित भय  कभी नहीं होता है। इसके अलावा मां की कृपा से भक्त को सर्वथा भय से मुक्ति मिलती है।

इन लोगों को विशेष रूप से करनी चाहिए मां कालरात्रि की पूजा 

मां कालरात्रि की पूजा करने से व्यक्ति को रोग, भय की परेशानी से निजात मिलती है। इसके अलावा विशेष रूप से जिन लोगों के जीवन में बीमारी बनी हुई है या फिर शत्रुओं से पराजय मिल रही है उन्हें माँ कालरात्रि की पूजा करने से लाभ मिलता है। इसके अलावा अगर किसी व्यक्ति के जीवन में ग्रह बाधा हो या किसी बात को लेकर भय बना हुआ हो तो ऐसे लोगों को भी नवरात्रि के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए।

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मां कालरात्रि से संबंधित पौराणिक कथा 

पौराणिक कथा की बात करें तो कहा जाता है कि एक बार रक्तबीज नाम के दैत्य ने चारों तरफ हाहाकार और आतंक मचा के रखा था। इसके आतंक से मानव से लेकर देवी देव सभी परेशान होने लगे थे। रक्तबीज को ऐसा वरदान मिला था कि अगर उसके रक्त की एक भी बूंद धरती पर गिरेगी तो उसी के समान एक और शक्तिशाली दैत्य तैयार हो जाएगा। 

ऐसे में रक्तबीज के सामान्य बलशाली दैत्य तैयार होता गया और उसका आतंक भी बढ़ता गया। तब रक्तबीज से परेशान होकर सभी देवगण भगवान शिव के पास पहुंचे। भगवान शिव को पता था कि रक्तबीज का अंत केवल मां पार्वती ही कर सकती हैं। तब उन्होंने मां पार्वती से अनुरोध किया और इसके बाद मां पार्वती ने अपनी शक्ति और तेज से माँ कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद रक्त बीज के साथ मां का युद्ध हुआ। इस युद्ध में रक्तबीज के शरीर से जितनी भी रक्त की बूंदे निकली उसे मां कालरात्रि ने अपने मुख में ले लिया। ऐसा करते-करते अंत में जब रक्तबीज का रक्त क्षीण हो गया  तब इस तरह से रक्तबीज का अंत हुआ।

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