परमात्मा की अंतिम देशना जीवन जीने की कला सिखाती है : आचार्य प्रसन्नचंद्र सागर

चरित्र से ही मनुष्य के जन्म मरण की मुक्ति संभव है। चरित्र को विशुद्ध बनाएंगे, तभी हमारी आत्मा का कल्याण हो सकता है।

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