महिलाओं की कुंडली में इन परिस्थितियों में बनता है वैधव्य योग, समय रहते हो जाएं सावधान!

ज्योतिष विज्ञान में किसी भी जातक की जन्मकुंडली के आधार पर उनके सम्पूर्ण जीवन का फल कथन किया जा सकता है। इस दौरान ज्योतिष विशेषज्ञ को जातक के जन्म से संबंधित कुछ जानकारी चाहिए होती है, जैसे: जन्म नाम, जन्म दिन, जन्म समय, जन्म स्थान आदि। इसके साथ ही उस जातक के स्त्री-पुरुष होने का विचार भी करना बेहद आवश्यक होता है क्योंकि माना जाता है कि कुछ ग्रह समान होते हुए कई बार स्त्री और पुरुष जातकों की कुंडली में अलग-अलग फल देते हैं। 

ये भी देखा जाता है कि कई ज्योतिषाचार्य कई परिस्थिति में पति की कुंडली का अध्ययन कर पत्नी के बारे में और पत्नी की कुंडली का अध्ययन कर पति के बारे में स्पष्ट रूप से जानकारी देने में समर्थ होते हैं इसलिए चलिए अब बिना देर किये समझने की कोशिश करते हैं कि उन सामान्य नियमों के बारे में जिससे स्पष्ट हो जाता है कि किसी स्त्री जातक की कुंडली में मौजूद कुछ ग्रहों का प्रभाव उनकी कुंडली को कैसे प्रभावित करता है।

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महिलाओं की कुंडली से जाने उसके पति के बारे में

स्त्री जातक की कुंडली में लग्न चर राशि का हो, तो शादी के बाद उस स्त्री का पति हमेशा विदेश यात्राएं करता रहेगा या उसका पति किसी विदेश में रहता होगा। यदि किसी महिला की जन्म कुंडली में सप्तम भाव में शनि देव की उपस्थिति हो और उन पर किसी अन्य पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो, ऐसी महिलाओं के विवाह में बहुत बाधाएं आती हैं या विवाह में विलंब होता है। यदि किसी महिला की कुंडली में सम ग्रह बुध और पाप ग्रह शनि कुंडली के सप्तम भाव में एक साथ उपस्थित हो तो, ये स्थिति उस महिला के पति को संतान उत्पन्न करने में असमर्थ बनाती है। वहीं किसी महिला की कुंडली के अष्टम भाव में शनि की उपस्थिति होने पर उसके पति के लिए ये स्थिति अनिष्टकारी सिद्ध होगी। 

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इसके अलावा महिला की कुंडली के लग्न में बुध और शुक्र हो तो उसे बहुत प्रेम करने वाला पति मिलता है।जबकि कुंडली के सप्तम भाव में अशुभ ग्रह होने पर महिला को क्रूर, निर्धन और चालाक व्यक्तित्व वाले पति की प्राप्ति होती है।यदि महिला की कुंडली के सप्तम भाव में कोई शुभ ग्रह हो तो उसका पति सुंदर, विवेकी, उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाला होता है। इसके अलावा कुंडली के सप्तम भाव में शनि और सूर्य का होना, इस स्थिति को दर्शाता है कि महिला का पति किसी कारणवश उसे छोड़कर जा सकता है।

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कुंडली में वैधव्य योग : विधवा योग

किसी महिला की जन्म कुंडली के सप्तम भाव में यदि लाल ग्रह मंगल हो और उस पर किसी अन्य पाप ग्रह की दृष्टि हो तो, इस स्थिति में उस महिला की कुंडली में वैधव्य योग का निर्माण होता है। यदि लग्न और सप्तम भाव में पाप ग्रह हो तो इस परिस्थिति में विवाह के महज सात वर्ष के बाद ही महिला के पति की मृत्यु संभव है। 

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इसके अलावा यदि कुंडली का सप्तमेश अष्टम भाव में हो और अष्टमेश सप्तम भाव में हो तो, इस स्थिति में भी विवाह के कुछ ही महीनों में महिला के पति की मृत्यु हो सकती है। वहीं कुंडली के अष्टम भाव में कोई पाप ग्रह शत्रु राशि में उपस्थित हो और उस ग्रह की महादशा भी चल रही हो तो, इस स्थिति में भी कुंडली में विधवा योग बनता है। यदि महिला की कुंडली में अशुभ ग्रह अपनी नीच राशि में हो या शत्रु राशि में द्वितीय, सप्तम या अष्टम भाव में हो तो उसके पति के लिए मृत्यु योग बनता है। इसके साथ ही यदि महिला की कुंडली में अष्टम भाव में सूर्य हो तो ये योग पति की असामयिक मृत्यु को दर्शाता है। 

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