मासिक शिवरात्रि स्पेशल: जानें क्यों की जाती है शिव जी के लिंग स्वरूप की पूजा?

भगवान शिव को समर्पित महाशिवरात्रि के बारे में तो हम सब जानते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म में हर महीने शिवरात्रि मनाने का भी प्रावधान है, जिसे मासिक शिवरात्रि कहा जाता है। दोनों ही शिवरात्रि बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। पिछले महीने यानी कि अक्टूबर माह की मासिक शिवरात्रि की बात करें तो यह 23 अक्टूबर 2022 को मनाई गई थी। नवंबर में मासिक शिवरात्रि 22 नवंबर 2022 को मनाई जाएगी। तो आइए जानते हैं मासिक शिवरात्रि के महत्व, व्रत-पूजन विधि, व्रत कथा आदि के बारे में। इसके अलावा इस ब्लॉग में हम आपको यह भी बताएंगे कि भगवान शिव के लिंग स्वरूप की पूजा क्यों की जाती है और घर में शिवलिंग रखने के क्या नियम होते हैं और इसके क्या फ़ायदे हैं। जानने के लिए अंत तक पढ़ें एस्ट्रोसेज का यह विशेष ब्लॉग!

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मासिक शिवरात्रि का महत्व

मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव की सच्चे मन से उपासना करने और व्रत करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। साथ ही हर मुश्किल से मुश्किल काम आसानी से पूरा होता है और मनुष्य की सभी समस्याओं का अंत होता है। शिव पुराण के अनुसार, जो कन्याएं अपने लिए योग वर की तलाश कर रही हैं, उन्हें भी इस व्रत के लाभकारी परिणाम देखने को मिलते हैं। साथ ही विवाह में आ रही सभी प्रकार की समस्याएं व रुकावटें दूर होती हैं।

मासिक शिवरात्रि व्रत-पूजन विधि

धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार कई लोग मासिक शिवरात्रि का व्रत रखते हैं। लेकिन जो लोग मासिक शिवरात्रि का व्रत करने की शुरुआत करने जा रहे हैं, उन्हें इस व्रत की शुरुआत महाशिवरात्रि के दिन से करनी चाहिए। यह व्रत महिला एवं पुरुष दोनों जातक कर सकते हैं। व्रत की शुरुआत करने के लिए महाशिवरात्रि की पूरी रात जागकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। आइए अब व्रत-पूजन विधि के बारे में जान लेते हैं:-

मासिक शिवरात्रि के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर नहाएं।किसी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और नंदी की पूजा करें।जल शुद्ध घी, दूध, चीनी, शहद और दही आदि से शिवलिंग का रुद्राभिषेक करें क्योंकि इससे भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं।फिर शिवलिंग पर साफ़-सुथरे बेलपत्र, धतूरा और श्रीफल अर्पित करें।इसके बाद धूप, दीपक, फल और फूल आदि से भगवान शिव का पूजन करें।पूजा के समय शिव पुराण, शिव स्तुति, शिव अष्टक, शिव चालीसा और शिव श्लोक का पाठ अवश्य करें।फिर शाम के समय फल आदि खाएं। लेकिन ध्यान रहे कि भूल से भी अन्न ग्रहण न करें।अगले दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करने के बाद दान-पुण्य करें। इसके बाद ही व्रत का पारण करें।इस दिन यदि आप सफेद वस्तुओं का दान करते हैं तो आपको विशेष कृपा की प्राप्ति होगी।पूजा के दौरान श्री हनुमान चालीसा का पाठ भी करें क्योंकि इससे आर्थिक समस्याओं का अंत होता है।हर तरह के कर्ज़ से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा सच्चे मन से करें।

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मासिक शिवरात्रि की व्रत कथा

पौराणिक कथाओं और धर्म ग्रंथों के अनुसार, भगवान शिव महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए था, जिसका पूजन सबसे पहले ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु ने किया था। तब से लेकर आज तक महाशिवरात्रि को शिव जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन का व्रत माता लक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, सीता, पार्वती और रति आदि देवियों ने अपने जीवन के उद्धार के लिए शिवरात्रि का व्रत किया था। यही वजह है कि मासिक शिवरात्रि के व्रत का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह व्रत जीवन में सुख-शांति-समृद्धि और भगवान शिव की कृपा पाने के लिए किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन का व्रत करने से अच्छे स्वास्थ्य और संतान प्राप्ति का वरदान भी मिलता है।

भगवान शिव के लिंग स्वरूप की पूजा क्यों की जाती है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव आदि और अंत के देवता हैं। इनका न कोई स्वरूप है और न कोई आकार। यही वजह है कि उन्हें निराकार कहा जाता है। हिन्दू धर्म में शिवलिंग को भगवान शिव का निराकार रूप माना जाता है। साकार रूप की बात करें तो उन्हें भगवान शंकर मानकर पूजा जाता है।

समस्त ब्रह्मांड में भगवान शिव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा लिंग रूप में की जाती है। इसका कारण यह है कि भगवान शिव सम्पूर्ण जगत के मूल कारण माने गए हैं, इसलिए उन्हें मूर्ति और लिंग दोनों रूपों में पूजा जाता है।

शिव अर्थात ‘परम कल्याणकारी’, लिंग मतलब ‘सृजन’। भगवान शिव के असल रूप से अवगत होकर जाग्रत हुई शिवलिंग का अर्थ होता है प्रमाण। वेदों के अनुसार, लिंग शब्द का अर्थ होता है सूक्ष्म शरीर, जो कि 17 तत्वों यानी कि मन, बुद्धि, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां और पांच वायु से बना होता है। वायु पुराण की बात करें तो प्रलयकाल में पूरी सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं।

मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग में बहुत ज़्यादा ऊर्जा होती है, इसलिए इसे घर में रखने के कुछ विशेष नियम व सावधानियां होती हैं, जिनके बारे में सभी लोगों को पता होना चाहिए।

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घर में शिवलिंग रखने के नियम व सावधानियां

आमतौर पर घर में बड़े आकार की शिवलिंग रखना वर्जित माना गया है। लेकिन शिव पुराण के अनुसार, यदि आप अपने घर में शिवलिंग की स्थापना करना चाहते हैं तो उसके कुछ विशेष और सख़्त नियम होते हैं। ध्यान रहे कि शिवलिंग स्थापना व उसके पूजन में कोई लापरवाही न करें क्योंकि जाने-अनजाने में यदि आपसे कोई ग़लती होती है तो भगवान शिव क्रोधित हो सकते हैं और आपको नकारात्मक फलों की प्राप्ति हो सकती है। आइए जानते हैं कि शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग स्थापना करने के क्या नियम होते हैं:-

शिव पुराण और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, घर में अंगूठे के ऊपर वाले पोर से बड़ा शिवलिंग नहीं रखना चाहिए क्योंकि शिवलिंग में बहुत अधिक ऊर्जा होती है। इस कारण से जातकों को अपने घर में ज़्यादा बड़े शिवलिंग की स्थापना करने से बचना चाहिए।घर में एक से अधिक शिवलिंग कभी न रखें। यदि आपके घर में एक से अधिक शिवलिंग हैं तो तुरंत हटा लें। हटाए गए शिवलिंग को आप किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर सकते हैं या फिर किसी मंदिर में रख सकते हैं।शिव पुराण के अनुसार, घर में शिवलिंग की स्थापना करने के लिए प्राण-प्रतिष्ठा करवाना अनिवार्य नहीं होता है।घर में रखा जाने वाला शिवलिंग सोने, चांदी या तांबे का होना चाहिए। साथ ही उसमें लिपटा हुआ सांप भी उसी धातु का होना चाहिए।पूजन के दौरान शिवलिंग पर कुछ चीज़ें अर्पित करना वर्जित माना जाता है, जैसे कि शंख से जल, नारियल पानी, तुलसी, केतकी के फूल, कुमकुम या सिंदूर और हल्दी आदि।

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शिवलिंग पूजन की विधि

सुबह उठकर नहाने के बाद, शिवलिंग और उसके आसपास के स्थान को अच्छी तरह से साफ़ करें।फिर शिवलिंग पर गंगाजल, दूध आदि चढ़ाकर अभिषेक करें।शिवलिंग की पूजा करने से पहले माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा करने का विधान है, इसलिए शिवलिंग के पास माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा, मूर्ति या फोटो अवश्य रखें।वर्जित चीज़ों के अलावा, शिवलिंग पर प्रसाद के तौर पर फल, मिठाई, भांग, धतूरा आदि चढ़ाएं।शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को कभी ग्रहण न करें। जो प्रसाद शिवलिंग के सामने रखा हो, सिर्फ़ उसे ही ग्रहण किया जा सकता है।शिवलिंग पर हमेशा 3 लकीरों वाला तिलक करें क्योंकि इसे भगवान शिव के माथे पर बनने वाला त्रिभुण्ड और उनके त्रिशूल (पिनाक) का प्रतीक माना जाता है।

भगवान शिव को प्रसन्न करने के मंत्र और लाभ

भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए शिव पुराण के अलावा, अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग मंत्रों का जिक्र किया गया है। हर एक मंत्र और हर एक शब्द का अपना अलग अर्थ है। सभी मंत्रों का उच्चारण अलग-अलग चीजों के लिए किया जाता है।

ऊँ नम: शिवाय 

यह भगवान शिव का सबसे प्रिय और सबसे सरल मंत्र होता है। आप शिवलिंग को जल देते समय और ध्यान करते समय इस मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं। इससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। इस मंत्र का उच्चारण 108 बार करना काफी लाभकारी माना जाता है।

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे। सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्। मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

यह मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है। महामृत्युंजय मंत्र के बारे में मान्यता है कि यह किसी भी व्यक्ति की अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है। शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय इस मंत्र का जाप करना बहुत फलदायी होता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र मंत्र

इस मंत्र की रचना गुरु शंकराचार्य ने की थी। वे बहुत बड़े शिव भक्त थे। इस पूरे मंत्र में नमः शिवाय का पूरा विवरण होता है। शिवलिंग के सामने बैठ कर, इसका जाप करने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

ॐ नमस्ते अस्तु भगवन 

भगवान शिव की पूजा-अर्चना शुरू करने के लिए इस मंत्र को काफी शुभ माना जाता है। इस मंत्र में भगवान शिव के अलग-अलग रूपों के नाम लिए जाते हैं। प्रतिदिन शिवलिंग के सामने इस मंत्र का जाप करने से मनुष्य के मन से भय खत्म होता है और व्यक्ति निडर बनता है।

शिव तांडव स्त्रोत

भगवान शिव को समर्पित शिव तांडव स्तोत्र दशानन ने रचा था और इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दशानन को रावण का नाम दिया था और उसे अपना सबसे बड़ा भक्त कहा था। शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव के सारे रूपों की वंदना करता है। प्रतिदिन शिवलिंग के सामने इस स्तोत्र का जाप करने से मनुष्य के सारे दुःख दूर होते हैं और सफलता मिलती है।

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