शादी के दौरान कन्यादान क्यों किया जाता है और क्या हैं इसके सही मायने !
हिंदू धर्म (Hindu Religion) में शादी के दौरान कई तरह की रस्में निभाई जाती हैं. कन्यादान भी उन्हीं रस्मों का हिस्सा है. शास्त्रों में कन्यादान को महादान बताया गया है. एक पिता अपनी बेटी का पालन पोषण करता है और विवाह के दौरान अपनी बेटी के हाथ पीले करके उसके हाथ को वर के हाथ में सौंप देता है. इसके बाद वर कन्या के हाथ को पकड़कर ये संकल्प लेता है कि वो उस कन्या से जुड़ी हर जिम्मेदारी को भलीभांति निभाएगा. इस रस्म को कन्यादान कहा जाता है. इस रस्म के जरिए एक पिता अपनी पुत्री की जिम्मेदारी उसके पति के हाथों में सौंपकर उसके नए जीवन को बसाता है. लेकिन कन्यादान का मतलब ‘कन्या का दान’ नहीं होता. वास्तव में लोग कन्यादान के सही अर्थ को जानते ही नहीं. यहां जानिए कन्यादान का सही अर्थ (Real meaning of Kanyadan) और कैसे शुरू हुई थी ये प्रथा !
भगवान श्रीकृष्ण ने बताए हैं कन्यादान के सही मायने
कन्यादान के सही मायने भगवान श्रीकृष्ण ने बताए हैं. श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन और सुभद्रा का गन्धर्व विवाह करवाया था, तो बलराम ने उसका विरोध किया. बलराम ने कहा कि सुभद्रा का कन्यादान नहीं हुआ है, जब तक कन्यादान नहीं होता, तब तक विवाह पूर्ण नहीं माना जाता है. तब श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘प्रदान मपी कन्याया: पशुवत को नुमन्यते?’ इसका मतलब है कि पशु की भांति कन्या के दान का समर्थन भला कौन कर सकता है? कन्यादान का सही अर्थ है कन्या का आदान, न कि कन्या का दान. शादी के दौरान कन्या का आदान करते हुए पिता कहते हैं कि मैंने अभी तक अपनी बेटी का पालन-पोषण किया जिसकी जिम्मेदारी मैं आज से आपको सौंपता हूं. इसके बाद वर कन्या की जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभाने का वचन देता है. इसको रस्म को कन्या का आदान कहा जाता है. इसका ये मतलब नहीं होता कि पिता ने पुत्री को दान कर दिया है और अब उसका कोई अधिकार नहीं रहा. वास्तव में दान तो सिर्फ वस्तु का किया जाता है जिसे आप अर्जित करते हैं, किसी इंसान का नहीं. बेटी परमात्मा की दी हुई सौगात होती है, उसका दान नहीं आदान किया जाता है और इस तरह उसकी जिम्मेदारी को वर को सौंपा जाता है. कन्या आदान को सुविधा की दृष्टि से कन्यादान कहा जाता है. लेकिन इसके सही अर्थ को नहीं बताया जाता, इसलिए आज भी लोग कन्यादान का गलत मतलब निकालते हैं.
कैसे शुरू हुई कन्यादान की प्रथा
शास्त्रों में बताया गया है कि कन्या का आदान सबसे पहले प्रजापति दक्ष ने किया था. उन्होंने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चंद्रदेव से करवाया था ताकि सृष्टि का संचालन सही तरीके से हो सके. तब उन्होंने चंद्रदेव को अपनी बेटियों की जिम्मेदारी सौंपते हुए कन्या आदान किया था. दक्ष की इन 27 पुत्रियों को ही 27 नक्षत्र माना गया है. तब से विवाह के दौरान कन्या आदान की प्रथा शुरू हो गई.
कन्यादान है महादान
शास्त्रों में कन्यादान को महादान माना गया है क्योंकि ये पिता और पुत्री की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. बेटी के जीवन को बसाने के लिए एक पिता उसकी जिम्मेदारियों को वर के हाथों में सौंप देता है. ये काम करते हुए एक माता-पिता को अपने दिल पर पत्थर रखकर दिल को कठोर करना पड़ता है. ये माता-पिता के परम त्याग को दर्शाता है. बेटी का घर सुखी देखकर माता-पिता खुद को भाग्यवान समझते हैं. माता-पिता के इस त्याग को सम्मान देते हुए शास्त्रों में महादान की श्रेणी में रखा गया है.
