समलैंगिक विवाह पर देवता ही नहीं दैत्यों को भी था ऐतराज, दिख जाएं तो हो सकती है अनहोनी

Gay Marriage in India: केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध करते ही एक बार फिर यह मुद्दा खबरों की खबर में है. समान लिंग वालों के विवाह और उनके एक साथ रहने को लेकर पहले भी लोगों का विरोध और समर्थन सामने आता रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि हिंदू धर्म स्त्री और पुरुष के विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है, उसमें समलैंगिक विवाह को लेकर क्या धारणाएं हैं? खास तौर पर तब जबकि कुछेक पौराणिक कथाओं में स्त्री के पुरुष में परिवर्तित हो जाने के बाद दूसरे पुरुष के साथ विवाह का प्रसंग मिलता हो. आइए सनातन परंपरा में समलैंगिक विवाह को लेकर क्या मान्यता है, इसे विस्तार से जानते हैं.

लोकमान्यताओं के अनुसार हिंदू धर्म में भगवान विष्णु और भगवान शिव के स्त्री रूप के मिलन से भगवान अयप्पा का जन्म हुआ था. इसी प्रकार एक श्राप के चलते राजा इल के स्त्री रूप में परिवर्तित होने के बाद ही उनका विवाह बुध से हुआ, लेकिन किसी देवी का अन्य देवी या फिर किसी देवता का किसी अन्य देवता के साथ विवाह का कोई जिक्र नहीं मिलता है. काशी विद्वत् परिषद् के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार हिंदू धर्म के किसी भी पवित्र ग्रंथ में समलैंगिक विवाह को स्वीकृति प्रदान नहीं की गई है. प्रो. द्विवेद्वी के अनुसार यह बिल्कुल भी शास्त्र सम्मत नहीं है, यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने न तो इसकी इजाजत दी और न ही कहीं इसका उल्लेख किया.

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समलैंगिकों के दर्शन से लगता है बड़ा दोष!

समलैंगिक विवाह समाज में कुरीति पैदा करने वाली परंपरा है. सबसे खास बात यह कि ऐसे विवाह की कोई सामाजिक उपयोगिता भी नहीं है. प्रो. द्विवेद्वी के अनुसार पौराणिक कथाओं में स्त्री श्रापवश या किसी अन्य कारण से स्त्री से पुरुष होने का प्रसंग तो मिलता है, लेकिन किसी पुरुष का पुरुष से या फिर स्त्री का स्त्री से विवाह होने का कोई भी जिक्र नहीं मिलता है. प्रो. द्विवेद्वी के अनुसार ऐसा विवाह करने वाले लोगों का दर्शन करने का ही बड़ा दोष लगता है. ऐसे में इस विवाह को बिल्कुल भी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए.

तब राजा इल और बुध का हुआ विवाह

हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि के अनुसार इस संसार के सबसे पहले ट्रांस्जेंडर का नाम राजा इल था. मान्यता है कि एक बार वे शिवलोक के उस प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश कर गए थे, जहां पर भगवान शिव और माता पार्वती विश्राम किया करते थे. मान्यता कि उस प्रतिबंधित क्षेत्र में जाना वाला कोई भी पुरुष व्यक्ति स्त्री में परिवर्तित हो जाया करता था. इस कारण राजा इल इला में परिवर्तित हो गए और उनका बाद में विवाह बुध से हुआ और उनसे पुरुरवा नाम की संतान हुई. जब पुरुरवा बड़े हुए तो उन्होंने अपनी मां के दु:खी होने पर उसका कारण पूछा. जब उन्हें सच्चाई ज्ञात हुई तो उन्होंने शिव साधना करके राजा इल को इस श्राप से मुक्ति दिलाई.

साधु संत भी कर रहे हैं पुरजोर विरोध

समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि साधु संत भी पुरजोर विरोध कर रहे हैं. स्वामी चक्रपाणि के अनुसार पुरातन काल में ऐसी घटनाएं परिस्थितिजन्य हुई हैं और उसमें भी स्त्री और पुरुष का ही विवाह हुआ है, न कि पुरुष और पुरुष का या फिर स्त्री और स्त्री और स्त्री का. स्वामी चक्रपाणि के अनुसार यह अवगुण देवताओं में छोडि़ए असुरों में भी नहीं था. इस अनैतिक कार्य को न तो मान्यता देना चाहिए और न ही होने देना चाहिए क्योंकि यह मानसिक विकृति है. ऐसे में किसी भी व्यक्ति की मानसिक समस्या को भूलकर भी सामाजिक समस्या में नहीं बदलने देना चाहिए. साथ ही साथ इसे प्रचारित और प्रसारित करने वालों पर भी सख्ती करनी चाहिए.

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