सूर्य के मिथुन में गोचर करते ही खुल जाएगी इन राशियों की किस्मत, अभी से नोट कर लें तारीख

सनातन धर्म में जहाँ सूर्य को देवता के रूप में पूजा जाने का विधान है। वहीं वैदिक ज्योतिष में समस्त ग्रहों में से सूर्य को राजा की उपाधि प्राप्त है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की आत्मा के रूप में सौरमंडल में विधमान हैं। ये ऊर्जा का सबसे बड़ा श्रोत हैं, जो पृथ्वी से प्रत्यक्ष रूप से नजर आते हैं। 

जिस प्रकार सौरमंडल के समस्त ग्रह अपनी समयावधि के अनुसार अपना स्थानपरिवर्तन करते हैं। उसी प्रकार सूर्य देव का गोचर भी हर 30 दिनों यानी हर एक माह में होता है। परंतु सूर्य देव अकेले ऐसे ग्रह हैं जो कभी वक्री नहीं होते। हिन्दू धर्म में सूर्य के गोचर काल को संक्रांति कहते हैं। एक वर्ष में कुल 12 संक्रांति होती है। भारत के कई राज्यों में सूर्य संक्रांति को एक पर्व की तरह मनाया जाता है। 

अब यही सूर्य देव जल्द ही अपना गोचर करते हुए राशिपरिवर्तन करेंगे। ऐसे में आइये जानें जल्द ही होने वाली संक्रांति की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और उससे जुड़ी संपूर्ण जानकारी।

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15 जून को सूर्य करेंगे मिथुन में गोचर

वर्ष 2022 में सूर्य देव 15 जून, बुधवार के दिन शुक्र की वृषभ राशि से निकलकर बुध की मिथुन राशि में विराजमान हो जाएंगे। ऐसे में देशभर में इसे मिथुन संक्रांति के रूप में मनाया जाएगा। समस्त संक्रांतियों में से मिथुन संक्रांति के दिन खासतौर से सूर्यदेव की पूजा-अर्चना किये जाने का महत्व है। विशेषकर हिन्दू धर्म में इस दिन को एक पवित्र पर्व की भांति मनाया जाता है। क्योंकि मान्यता अनुसार इसी दिन से वर्षा ऋतु की शुरूआत होती है, जिससे प्रकृति में कई बड़े बदलाव नज़र आने लगते हैं। कई राज्यों में मिथुन संक्रांति को रज पर्व के रूप में भी जाना जाता है। लोग इस पर्व पर भगवान सूर्य देव से प्रार्थना करते हुए अच्छी खेती और अच्छी बारिश की विनती करते हैं। इसके लिए उन्हें प्रसन्न करने हेतु व्रत, दान-पुण्य आदि कार्य किया जाता है। । 

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गोचरकाल की समयावधि 

हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष 2022 में मिथुन संक्रांति आषाढ माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को यानी 15 जून बुधवार को पड़ रही है। क्योंकि इसी दिन दोपहर 11:58 बजे पर सूर्यदेव अपना गोचर मिथुन राशि में करेंगे और सूर्य इस स्थिति में अगले माह की 16 जुलाई तक रहेगा। फिर इसके बाद पुनः अपना गोचर करते हुए वे चन्द्रमा की राशि कर्क में प्रवेश कर जाएगा।

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मिथुन संक्रांति का धार्मिक व ज्योतिषीय महत्व 

भारत के पूर्वी राज्य विशेषकर ओड़िसा के लोग मिथुन संक्रांति को एक पर्व की तरह मनाते हैं। इस दौरान वे सूर्यदेव से अच्छी फसल के लिए पर्याप्त मात्रा में बारिश की मनोकामना करते हुए उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। जब 15 जून, बुधवार के दिन सूर्य मिथुन राशि में अपना गोचर करेंगे, तब समस्त नक्षत्रों में राशियों की दिशा में भी बदल आएगा। वातावरण के अनुसार इस बदलाव को बड़ा व महत्वपूर्ण माना जाता है। स्वयं एस्ट्रोसेज के विशेषज्ञों की मानें तो जब सूर्य देव कृतिका नक्षत्र से भ्रमण करते हुए रोहिणी नक्षत्र में आते हैं तो, उससे वर्षा ऋतु होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में 16 जून को ही सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में आ जाएंगे और फिर से रोहिणी से मृगशिरा में अपनी चाल शुरू कर देंगे। ये देखा गया है कि मिथुन संक्रांति के बाद से ही भारत में वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। कई राज्यों में इस दिन सूर्यदेव की विधि-विधान अनुसार पूजा की जाती है। इस दौरान अपनी कुंडली में सूर्य ग्रह की शांति के लिए लोग स्नान, दान-पुण्य और यज्ञ का आयोजन भी करते हैं। मिथुन संक्रांति को रज पर्व के रूप में मनाते हुए कई राज्यों में व्रत करने का विधान भी है।।पौराणिक महत्वता के अनुसार इस दिन लोग सिलबट्टे की दूध और पानी से पूजा करने की सदियों पुरानी परंपरा भी निभाते हैं। 

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सूर्य के मिथुन में गोचर से देशभर में आएंगे बड़े बदलाव

वैदिक ज्योतिषियों की मानें तो मिथुन संक्रांति के दौरान वातावरण और मौसम में बदलाव होते हैं। जिससे इस दौरान लोगों में कोई वायरल या संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए आपको अपनी सेहत के प्रति सावधानी बरतते हुए ज्यादा ठंडा या ज्यादा गर्म खाने से बचना होगा। 

मिथुन संक्रांति पर वर्षा ऋतु की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए कई ज्योतिषी अपनी भविष्यवाणी में वर्ष 2022 में मानसून को लेकर 15 जून के आस-पास का अनुमान लगा रहे हैं।  

मिथुन में बनेगा बुधादित्य योग 

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य और बुध का किसी राशि में एकसाथ विराजमान होना या युति करना ही बुधादित्य योग का निर्माण करता है। मिथुन राशि में ये शुभ योग 2 जुलाई से 15 जुलाई तक बनेगा। जिसके परिणामस्वरूप खासतौर से मिथुन राशि के जातक अपने करियर को लेकर पहले से अधिक गंभीर नज़र आएंगे। इससे उनका अपने लक्ष्यों के प्रति रुझान साफ़ देखा जाएगा। साथ ही मिथुन राशि में इस योग का बनना कई जातकों को अपने किसी पुराने ऋण से निजात दिलाने का कार्य भी करेगा। वो जातक जो सरकारी क्षेत्र में कार्यरत हैं, उन्हें अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी।

विभिन्न राशियों पर इस गोचर का प्रभाव 

मिथुन संक्रांति के दौरान खासतौर से मिथुन, सिंह और कन्या राशि के जातकों को अधिक उत्तम फल मिलने की संभावना रहने वाले है। जबकि मेष, मकर और कुंभ राशि के जातकों को इस दौरान थोड़ा अधिक सावधान रहने की सलाह दी जाती हैं। क्योंकि इस तीन राशि के जातकों को इस दौरान सूर्य देव अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की समस्या देने का कार्य करेंगे। 

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मिथुन संक्रांति की पूजा-विधि 

मिथुन संक्रांति पर सूर्यदेव के पूजन के लिए सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान-कर्म करें। इसके पश्चात् साफ़ वस्त्र धारण करें और सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें लाल रोली, लाल फूल मिलाएं।  अब उगते हुए सूर्य के नग्न आंखों से दर्शन करते हुए, उन्हें नमस्कार करें और फिर उन्हें धूप-दीप आदि दिखाकर उनका पूजन करें। सूर्य नमस्कार के बाद सूर्य देव को “ॐ घृणि सूर्याय नम:” मंत्र का जप करते हुए अर्घ्य दें।सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पूर्व दिशा में मुख करके किसी लाल रंग के आसन पर बैठे। अब सूर्य के बीज मंत्र “ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः” का कम से कम 7000 बार जप करें। 

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मिथुन संक्रांति के उपाय

मिथुन संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए।संभव हो तो सुबह सूर्यदेव के किसी मंदिर में जाकर दान-पुण्य करें। गरीब व जरूरतमंदों में हरे रंग की वस्तुओं का दान करना भी उचित रहेगा। माना जाता है कि इस दिन पालक, मूंग की दाल, हरे रंग के वस्त्र व महिलाओं में चूड़ियों का दान करना अत्यंत शुभ सिद्ध होता है। इस दिन व्रत करने से जातक को अपने दुखों से मुक्ति मिलती है। ये भी माना जाता है कि सूर्यदेव को अर्घ्य देने वाले जल को जमीन पर न गिराते हुए, उस पवित्र जल को किसी बड़े तांबे के बर्तन में इकट्ठा कर लें और पूजा के बाद उस पवित्र जल को किसी वृक्ष की जड़ में डालना उत्तम होता है। 

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