14 अप्रैल को रखा जाएगा गुरु प्रदोष व्रत, जानें इस व्रत का शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और कथा !

एकादशी की तरह प्रदोष का व्रत (Pradosh Vrat) भी हर माह में दो बार रखा जाता है. ये व्रत महादेव को समर्पित है. ये व्रत त्रयो​दशी तिथि को रखा जाता है. सप्ताह के दिन के नाम से प्रदोष व्रत के अलग नाम और महत्व होता है. चैत्र के महीने का दूसरा प्रदोष व्रत (Second Pradosh Vrat of Chaitra Month) 14 अप्रैल का पड़ने जा रहा है. गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत होने के कारण इसे गुरु प्रदोष (Guru Pradosh) के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि महादेव को प्रदोष का व्रत बेहद प्रिय हैं. महादेव तो इतने भोले हैं, कि उनका कोई भक्त एक लोटा जल भी प्रेम से चढ़ाए, तो वे प्रसन्न हो जाते हैं. ऐसे में अगर कोई भक्त प्रदोष व्रत विधि विधान से रहे और महादेव का पूरी श्रद्धा से पूजन करे, तो ये व्रत जरूर फलित होता है और भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है. यहां जानिए चैत्र माह के गुरु प्रदोष व्रत से जुड़ी खास बातें.

शुभ मुहूर्त

त्रयोदशी तिथि 14 अप्रैल सुबह 04:49 बजे से शुरू होगी और अगले दिन 15 अप्रैल 2022, शुक्रवार को सुबह 03:55 मिनट तक रहेगी. 14 तारीख को उदया तिथि में त्रयोदशी तिथि लगने के कारण व्रत 14 अप्रैल को ही रखा जाएगा. इस व्रत की पूजा शाम को प्रदोष काल में होती है. ऐसे में व्रत के लिए शुभ समय शाम 06:42 से रात्रि 09:02 बजे तक रहेगा.

प्रदोष व्रत का महत्व

त्रयोदशी तिथि दिन के हिसाब से अलग महत्व होता है. गुरु प्रदोष को लेकर कहा जाता है कि ये व्रत व्यक्ति की मनोकामना पूरी करने के साथ उसे कर्ज से मुक्ति दिलाने वाला होता है. इस व्रत को रखने से व्यक्ति की आर्थि​क स्थिति बेहतर होती है और शत्रुओं का नाश होता है. इसके अलावा नि:संतान दंपति व्यक्ति श्रद्धा के साथ प्रभु की आराधना करें, तो उन्हें संतान सुख प्राप्त होता है.

प्रदोष व्रत पूजा विधि

इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करके भगवान शिव के सामने प्रदोष व्रत का संकल्प लें. दिनमें भगवान का पूजन करके व्रत नियमों का पालन करें. शाम को स्नान करने के बाद प्रदोष काल में ​विधि-विधान से शिव पूजन करें. इस दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद, घी व गंगाजल से अभिषेक करें. धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पित करें. गुरु प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें. शिव मंत्र का जाप करें और आखिर में आरती करें और भगवान से अपनी गलती के लिए क्षमायाचना करें.

गुरु प्रदोष व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार इंद्र और वृत्तासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ. देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर दिया. ये देख वृत्तासुर अत्यंत क्रोधित हो गया और आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया. इसके बाद सभी देवता उसके रूप को देखकर डर गए और गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहुंचे. बृहस्पति महाराज बोले कि पहले आप लोगों को वृत्तासुर का वास्तविक परिचय जानने की जरूरत है.

वृत्तासुर पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था. एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया और वहां शिवजी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख उसने उपहास उड़ाते हुए कहा कि हे प्रभु! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं, लेकिन देवलोक में ऐसा नहीं दिखा कि स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे.

चित्ररथ के यह वचन माता पार्वती क्रोधित हो गईं और बोलीं दुष्ट तूने सर्वव्यापी महादेव के साथ मेरा भी उपहास किया है, आज तुझे वो दंड दूंगी कि तू कभी किसी संत का उपहास करने का दुस्साहस नहीं करेगा. अब तू दैत्य स्वरूप धारण करेगा.

जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हुआ और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्तासुर बना. वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिवभक्त था. गुरु बृहस्पति ने कहा कि हे इंद्र अगर वृत्तासुर को पराजित करना है तो महादेव को प्रसन्न करे और गुरु प्रदोष का व्रत रखो. देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर गुरु प्रदोष व्रत किया. महादेव के आशीर्वाद से उन्होंंने वृत्तासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शांति छा गई.

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