दया की रोशनी ही में इंसान के अच्छे गुण विकसित होते हैं, पढ़ें इससे जुड़ी 5 बड़ी सीख

दया को ईश्वरीय गुण और सभी धर्मों का मूल माना गया है. मान्यता है कि यह गुण जैसे ही इंसान के भीतर पनपना प्रारंभ होता है, वह महान बनने की ओर आगे बढ़ने लगता है. मान्यता है कि जहां दया होती है, वहीं धर्म का वास होता है. कभी भी कोई व्यक्ति सोच कर दयालु नहीं बनता है, यह तो इंसान का स्वाभाविक गुण है जो व्यक्ति के भीतर अपने आप पनता है, किसी के कष्ट को देखकर उसकी तकलीफ को दूर करने के लिए, बगैर इस बात की चिंता या आस लिए कि ऐसा करने पर उसे लाभ या हानि होगी.

संतो-महापुरुषों का कहना है कि जो व्यक्ति दूसरों की प्रशंंसा करते अपने आपको धनी महसूस करता है, दूसरों से ईर्ष्या नहींं करता है, दूसरों के सुख में भी सुख का अनुभव करता है और जो उदार होते हुए सभी पर दया और प्रेम लुटाता है, वह तिजोरी में रखे धन से ज्यादा कहीं धनवान है क्योकि ये वो गुण हैं, जो कोई चोर उसे चुरा नहीं सकता है. आइए जीवन में दया के मायने समझने के लिए पढ़ते हैं सफलता के मंत्र.

दया ईश्वर की तरफ से दिया दोतरफा उपहार है, जो न सिर्फ करने वाले के ऊपर बरसती है, बल्कि जिस पर की जाती है, उसे भी इसका लाभ मिलता है.
लोगों के साथ विनम्रता से पेश आना और एक छोटी सी दयालुता दिखाना धनी होने से ज्यादा कहीं ज्यादा बेहतर होता है क्योंकि इसी दया से समाज एक सूत्र में बंधा हुआ है.
एक पेड़ अपने लदे हुए मीठे फलों से और एक इंसान अपने अच्छे कर्मों से पहचाना जाता है. लोगों के साथ आपकी विनम्रता और दयालुता आपको बड़ी पहचान दे जाती है.
दया से जुड़ा एक छोटा सा कार्य हजारों लोगों के द्वारा की जाने वाली प्रार्थना से भी अधिक बड़ा होता है.
जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा दुष्टों के घर में भी प्रकाश देते हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुष गुणों से हीन व्यक्तियों पर भी दया दिखाते हैं.

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