Badrinath Yatra 2023: बद्रीनाथ के कपाट खुलने से पहले आखिर क्यों की जाती है गरुण देवता की पूजा

उत्तराखंड में स्थित बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है. जगत के पालनहार माने जाने वाले श्री हरि के इस पावन मंदिर के कपाट छह महीने बाद 27 अप्रैल 2023 को खुलने जा रहे हैं. भगवान बद्रीनाथ मंदिर के कपाट इस साल परंपरागत तरीके से पूजन करने के बाद सुबह 07:00 बजे खोले जाएंंगे. मंदिर के कपाट खुलने से पहले जोशीमठ में स्थित नरसिंह मंदिर में गरुड़ छाड उत्सव मनाने की परंपरा है. हर साल जोशीमठ में होने वाले इस गरुड़ छाड़ मेले में बड़ी संख्या में भगवान बद्रीनाथ के भक्त शामिल होते हैं. आइए भगवान बद्रीनाथ की पूजा से जुड़ी इस परंपरा के बारे में विस्तार से जानते हैं.

गरुड़ की पूजा का धार्मिक महत्व

ज्योर्तिमठ से जुड़े स्वामी मुकुंदानंद जी के अनुसार भगवान बद्रीनाथ के कपाट खुलने से पहले मनाए जाने वाले गरुड़ छाड उत्सव की परंपरा भगवान विष्णु और उनकी सवारी माने जाने वाले गरुड़ देवता से जुड़ी है. गरुड़ छाड उत्सव वाले दिन भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर जोशीमठ से अपने पावन धाम को प्रस्थान करते हैं. गरुड़ छाड़ उत्सव में रस्सी के सहारे भगवान विष्णु व गरुड़ के प्रतीक को लाया जाता है. धार्मिक परंपरा के अनुसार हर साल इस उत्सव में रस्सी में लकड़ी से बनी गरुड़ देवता की प्रतिमा को बांधकर दूसरे छोर के लिए छोड़ा जाता है.

कैसे मनाया जाता है गरुड़ छाड उत्सव

भगवान बद्रीनाथ से जुड़ी इस परंपरा को निभाने के लिए जोशीमठ में बड़ी संख्या में वैष्णव भक्त शामिल होते हैं. स्थानीय लोगों का मान्यता है कि जिस महिला को रस्सी से जुड़े गरुण देवता को पावन स्पर्श हो जाता है, उस पर उनका पूरा आशीर्वाद बरसता है और उसकी स्वस्थ एवं सुंदर संतान पाने की कामना शीघ्र ही पूरी होती है. बद्रीनाथ मंदिर से जुड़े पुजारी भास्कर डिमरी के अनुसार गरुड़ देवता की यह मूर्ति काफी पुरानी है और इसका बहुत ज्यादा पौराणिक महत्व है. इस पवित्र मूर्ति को आधा किमी लंबी रस्सी के जरिए प्रतीकात्मक रूप से गरुड़ देवता को बद्रीनाथ मंदिर की ओर उड़ाया जाता है. गरुड़ छाड उत्सव के दिन जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर में विधि-विधान से पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन आदि धार्मिक कार्यक्रम होते हैं.

तब खोले जाएंगे बद्रनाथ धाम के कपाट

गरुड़ छाड उत्सव के बादटिहरी गढ़वाल के महाराज के यहां चला गाडू़ घड़ा नरसिंह मंदिर पहुंच जाएगा. इसके बाद कल 25 अप्रैल को यह कलश यात्रा पांडुकेश्वर और 26 अप्रैल 2023 को बद्रीविशाल धाम पहुंच जाएगी और उसके अगले दिन रावल पुजारियों द्वारा भगवान के मंदिर का भव्य कपाट आम भक्तों के लिए खोल दिया जाएगा.

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(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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