Buddha Purnima 2022 : कैसे राजकुमार सिद्धार्थ ने तय किया भगवान गौतम बुद्ध बनने का सफर ? जानें बुद्ध से जुड़ी खास बातें

वैशाख माह की पूर्णिमा तिथि को भगवान गौतम बुद्ध (Lord Gautam Buddha) का जन्म हुआ था. माना जाता है कि इसी दिन ही भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति भी हुई थी. इसलिए हर साल वैशाख पूर्णिमा के दिन को बुद्ध जयंती और बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. भगवान बुद्ध को नारायण का नौवां अवतार माना जाता है. भगवान बुद्ध ने ही बौद्ध धर्म (Buddhism) की नींव रखी थी, जिसे आज पुरी दुनिया में जाना जाता है. आज भारत समेत जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, चीन, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, कंबोडिया, हांगकांग, मंगोलिया, तिब्बत, भूटान, म्यांमार और श्रीलंका आदि तमाम देशों में बौद्ध धर्म के अनुयायी रहते हैं. इस बार बुद्ध पूर्णिमा 16 मई को पड़ रही है. इस अवसर पर जानिए भगवान गौतम बुद्ध से जुड़ी खास बातें.

भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी रोचक बातें

भगवान गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में एक राजसी परिवार में हुआ था. सिद्धार्थ के जन्म के मात्र सात दिन बाद ही इनकी मां की मृत्यु हो गई थी. मां की मृत्यु के बाद इनकी मौसी ने इनका लालन-पालन किया. गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था.

बुद्ध के जन्म बाद एक असिता नामक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी, कि ये बालक बड़े होकर एक बड़ा धर्म गुरु बनेगा और लोगों के कल्याण के लिए काम करेगा. सबको सत्य की राह दिखाएगा. ये भविष्यवाणी सत्य न साबित हो, इसके लिए उनके पिता शुद्धोदन ने काफी प्रयास किए लेकिन अंत में गौतम बुद्ध ने वैराग को चुना और 27 साल की उम्र में सिद्धार्थ ने अपना घर और राजसी सुख त्याग दिया था.

संन्यासी बनने के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया. यहां उन्होंने चार आर्य सत्यों की शिक्षा दी. ये चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म के सार हैं. पहला आर्य सत्य है ‘दुःख अर्थात् संसार दुःखमय है’ दूसरा ‘दुःख-समुदय अर्थात् दुःखों का कारण भी हैं’ तीसरा ‘दुःख-निरोध अर्थात् दुःखों का अन्त सम्भव है’ और चौथा आर्य सत्य है ‘दुःख-निरोध-मार्ग अर्थात् दुःखों के अन्त का एक मार्ग है’.

गौतम बुद्ध के मन में वैराग्य की भावना एक वृद्ध, एक रोगी, एक अर्थी और एक संन्यासी को देखने के बाद आयी थी. नगर भ्रमण के दौरान उन्होंने इन सबके बारे में अपने सारथी से पूछा, तो सारथी ने बताया कि जीवन में बुढ़ापा आने पर व्यक्ति रोगी हो जाता है और रोगी होने के बाद मृत्यु को प्राप्त करता है. एक सन्यासी ही है जो मृत्यु के पार जीवन की खोज में निकलता है. ये सुनने के बाद बुद्ध के मन में राजसी सुख छोड़कर वैराग्य धारण करने का खयाल आया.

35 वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ को बिहार के बोधगया में बरगद के वृक्ष के नी​चे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी. कहा जाता है कि आज भी ये वृक्ष मौजूद है. इसे अब बोधीवृक्ष कहा जाता है.

सन्यासी बनने के बाद भगवान बुद्ध ने लोगों को समझाया कि सिर्फ मांस खाने वाला ही अपवित्र नहीं होता, बल्कि क्रोध, व्यभिचार, छल, कपट, ईर्ष्या और दूसरों की निंदा करने वाला भी अपवित्र ही होता है. मन को शुद्ध करने के लिए इन आदतों को त्यागना जरूरी है. यही कारण है कि बुद्ध की शिक्षा को याद करते हुए लोग बुद्ध पूर्णिमा के दिन लोग गरीबों व असमर्थ लोगों को जरूरत की वस्तुएं दान करते हैं और पक्षियों को भी पिंजरों से आजाद करते हैं.

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