Hanuman Chalisa: हनुमान चालीसा विवाद पर साधु-संतों की दो टूक, मूल रचना में नहीं करेंगे कोई बदलाव

हिंदू धर्म में बल और बुद्धि के सागर माने जाने वाले बजरंगबली का आशीर्वाद पाने के लिए जिस हनुमान चालीसा का पाठ करना सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी माना गया है, उसमें चित्रकूट के संत जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा कुछेक गलतियों को निकालने के बाद विवाद पैदा हो गया है. सालों साल से पढ़ी जा रही हनुमान चालीसा में बदलाव को लेकर जहां लोग असमंजस की स्थिति में खुद को पा रहे हैं तो वहीं संतों ने इस मांग को पूरी तरह से नकारते हुए इसे गोस्वामी तुलसीदास जी की रचनाओं के साथ छेड़छाड़ करार दिया है.

पद्मविभूषण रामभद्रचार्य द्वारा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित किसी कृति में कमी निकालने का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले वे तुलसीकृत रामचरितमानस में 3000 से ज्यादा गलतियों का दावा करते हुए अपनी एक अलग मानस की प्रति तक छाप चुके हैं. जिस पर विवाद गहराने और अखिर भारतीय अखाड़ा परिषद की आपत्ति के बाद उन्हें लिखित में माफी तक मांगनी पड़ी थी. बहरहाल, जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा एक बार फिर तुलसीकृत हनुमान चालीसा में गलतियां निकालने और उसमें बदलाव किए जाने की मांग को लेकर संत समाज उनके दावे पर कड़ा ऐतराज जता रहा है.

चालीसा के गलत होने का क्या है प्रमाण ?

इससे पूर्व रामचरितमानस में गलतियां निकालने के लिए उनका अयोध्या में लंबे समय तक बहिष्कार किया गया था. हनुमान चालीसा की जो चौपाईयां सैकड़ों वर्षों से पढ़ी जा रही है, उस पर उनकी आपत्ति का आखिर आधार क्या है. आखिर उनके पास कौन सा प्रमाण आ गया है? क्या उनके हाथ गोस्वामी तुलसीदास जी की पाण्डुलिपि लग गई है?

सनातन धर्म में शास्त्रार्थ की परंपरा है. शंकराचार्य हों या फिर मंडल मिश्र या फिर कुमारिल भट्ट या फिर रामानुजाचार्य रहे हों कोई यह कहने की स्थिति में कभी नहीं रहा कि मैं ही सही हूं. सभी ने अपने-अपने युग में अपने-अपने तरीके से बात की है. यदि हमें कोई गलती लगती है तो हम अपने लिए अगल हनुमान चालीसा लिख लें. स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती कहते हैं कि जिसे अपनी विद्वता का घमंड हो जाए वह काशी आकर शस्त्रार्थ की चुनौती देता है.

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शब्दों और भावना से न हो छेड़छाड़

हनुमान चालीसा विवाद पर स्वामी चक्रपाणि के विरोध जताते हुए कहा है कि हिंदू महासभा और संत महासभा स्वामी रामभद्राचार्य जी की बात का समर्थन नहीं करती है. उनके अनुसार तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा के प्रति शुरु से चली आ रही भावना और शब्दो के साथ किसी भी सूरत में छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए. यदि जगद्गुरु रामभद्राचार्य इस तरह की सोच से काम कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर वे गलत कर रहे हैं. इससे पहले उन्हें ऐसी चीजों के लिए अखाड़ा परिषद से माफी भी मांगनी पड़ी थी. यदि उन्हें किसी चीज को लेकर असहमति है तो सार्वजनिक मंच का इस्तेमाल करने की बजाय विद्वत परिषद को बुलाकर अपनी बात रखनी चाहिए. इस तरह दावा करने पर लोगों के बीच भ्रम पैदा होता है.

अपनी अलग लिख लें चालीसा

दिल्ली स्थित कालका मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत के अनुसार यदि रामभद्राचार्य जी को वह भाषा नहीं पसंद है या फिर कोई आपत्ति है तो वो हनुमान जी की एक अलग चालीसा लिख दें. तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा से छेड़छाड़ नही किया जा सकता है. मूल रचना में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए.

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