Kabirdas Jayanti 2023: कलयुग में आखिर अमृत के समान है क्यों मानी जाती है कबीर वाणी

Kabirdas Jayanti 2023: हर साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को कबीर दास की जयंती के रूप में मनाया जा रहा है. आज संत कबीर दास जी की जयंती देशभर में मनाई जा रही है. वे भक्तिकाल के प्रमुख लेखक कवि रहे थे. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में सन् 1398 में हुआ था. वे एक प्रसिद्ध लेखक और कवि भी थे. संत कबीर दास जी ने समाज सुधार पर बहुत जोर दिया था. साथ ही उन्होंने अपने दोहों के जरिए जीवन जीने की सीख दी है. आईए जानते हैं उनके कुछ ऐसे ही अनमोल दोहे.

दरअसल, कबीर दास जी ने अपने अनमोल विचार उन्होंने दोहे में पिरोए कर रखे थे, जिसमें सुखमय जीवन का राज छिपा है. उन्होंने अपने दोहे के माध्यम से चल रहे आडंबर और अंधविश्वास का जमकर विरोध किया. यही कारण है कि आज संत कबीर दास को एक बड़े समाज सुधारक के रूप में जाना जाता है, इसलिए इन्हें समाज सुधारक के रूप में भी जाना जाता है.

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कबीर दास जी के दोहे

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय, जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय” इसका अर्थ होता है कि हम सभी परेशानियों में फंसने के बाद ही ईश्वर को याद करते हैं. सुख में कोई याद नहीं करता. अगर सुख में याद करें तो फिर परेशानी क्यों आएगी.
“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब” इसका मतलब होता है कि हम सब के पास समय बहुत ही कम है. इसलिए जो काम हम कल करने वाले थे, उसे आज करो और जो काम आज करने वाले हैं उसे अभी करो क्योंकि पल भर में प्रलय आ जाएगा तो आप अपना काम कब करोगे.
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए”. इसका अर्थ कबीर दास जी बताते हैं कि हमेशा ऐसी भाषा बोलने चाहिए जो सामने वाले को सुनने से अच्छा लगे और उन्हें सुख की अनुभूति हो और साथ ही खुद को भी आनंद का अनुभव हो.
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो मन देखा अपना, मुझ से बुरा न कोय” कबीर दास का कहना था कि वे सारा जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगे रहे थे. लेकिन जब उन्होंने खुद को देखा तो उन्हें लगा कि उनसे बुरा इंसान कोई भी नहीं है. वे सबसे स्वार्थी और बुरे हैं. ऐसे ही लोग भी दूसरे के अंदर बुराइयां देखते हैं लेकिन, खुद के अंदर कभी जाकर नहीं देखते अगर वह खुद के अंदर झांक कर देखे तो उन्हें भी पता चलेगा कि उनसे बुरा इंसान कोई भी नहीं है.
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही, सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही” इसका अर्थ होता है कि जब मैं अपने अहंकार में डूबा था, तब प्रभु को न देख पाता था, लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया, तब अज्ञान का सब अंधकार मिट गया. ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया है.

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