Parijat Tree: स्वर्ग का वो पेड़, जिसे लगा था देवराज इंद्र का श्राप, आज भी नहीं खिलते दिन में फूल

ऐसे बहुत से पेड़ हैं, जिनको देवतुल्य मानकर पूजा जाता है. ये पेड़ न सिर्फ औषधीय गुणों से भरपूर हैं बल्कि इनका पौराणिक और धार्मिक महत्व भी है. ऐसा ही दैवीय शक्तियों से भरपूर पारिजात का पेड़ भी है. इस पेड़ का कनेक्शन स्वर्ग से है. पौराणिक कथाओं के मुताबिक यह पेड़ धरती पर स्वर्ग से आया था. पारिजात का पेड़ सिर्फ स्वर्ग में ही था. इसके फूल इतने मनमोहक और खूबसूरत थे कि हर कोई इसे पा लेना चाहता था. दैत्यों ने कई बार स्वर्ग पर आक्रमण कर इस पेड़ को अपने साथ पाताल लोक ले जाने की कोशिश की लेकिन वह असफल रहे. माना ये भी जाता है कि दिल से जुड़ी बीमारी समेत अन्य रोगों को भी दूर करने की शक्ति इस पेड़ में है. इस पेड़ की उत्पत्ति से जुड़ी कई कहानियां बताई जाती हैं. क्या है इस पेड़ की कहानी जानें यहां.

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कैसे हुई पारिजात के पेड़ की उत्पत्ति

शास्त्रों के मुताबिक देव और दानवों के बीच हुए समुद्र मंथन के दौरान जो 14 रत्न बाहर निकले उनमें पारिजात का पेड़ भी शामिल था. स्वर्ग के राजा इंद्र इस पेड़ को अपने साथ स्वर्ग लोक ले गए और वहीं इसे स्थापित कर दिया. कहा ये भी जाता है कि भगवान कष्ण ने देवराज इंद्र से इस पेड़ का एक बीज लेकर देवी रुक्मिणी को गिफ्ट स्वरूप भेंट किया था. जब यह पेड़ फलने-फूलने लगा और इसकी खुशबू दूर-दूर तक फैलने लगी तो देवर्षि नारद ने भगवान कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा को इस फूल को पाने के लिए उकसा दिया.जिसके बाद सत्यभामा उस पेड़ की मांग श्री कृष्ण से करने लगीं. वह इसे पाने के लिए इस कदर जिद पर अड़ गईं कि भगवान कृष्ण को बल के जोर पर पारिजात के पेड़ को स्वर्ग से जीतकर लाना पड़ा और सत्यभामा को भेंट करना पड़ा.

दिन में क्यों नहीं खिलते पारिजात के फूल

पौराणिक मान्यता के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण जब पारिजात का पेड़ स्वर्ग से लेकर जा रहे थे तो इस दौरान देवराज इंद्र ने पेड़ को श्राप दे दिया उन्होंने कहा कि पारिजात के फूल दिन में कभी नहीं खिलेंगे और इस पर कभी फल भी नहीं आएगा. माना जाता है कि इसी श्राप की वजह से पारिजात के फूल सिर्फ रात में ही खिलते हैं. इसे हरश्रृंगार, शैफाली, प्राजक्ता जैसे नामों से भी जाना जाता है.

(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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