Ram Navami 2023: कब और कैसे हुई भगवान राम की मृत्यु, पढ़ें उनके स्वर्गलोक जाने का रहस्य

सनातन परंपरा में भगवान राम का नाम ऐसा महामंत्र है जो जीवन की शुरुआत से लेकर अंत तक जुड़ा रहता है. हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार यह मंत्र सभी दु:खों को दूर और सभी सुखों को दिलाने वाला माना गया है. पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान राम सूर्यवंशी थे और उन्होंने अयोध्या के राजा दशरथ के यहां रानी कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया था. अयोध्या स्थित श्री रामजन्मभूमि में रामलला के पुजारी स्वामी सत्येंद्र दास जी महाराज के अनुसार भगवान श्री विष्णु के अवतार माने जाने वाले प्रभु श्री राम का जन्म त्रेतायुग में चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को दोपहर 12 बजे हुआ था.

भगवान विष्णु ने अपना यह सातवां अवतार मनुष्य के रूप में लिया था, ताकि पृथ्वी पर धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश सुनिश्चित हो. अपने जीवन काल में भगवान राम ने न सिर्फ अधर्मियों का नाश किया बल्कि कई लोगों को उनका हक दिलाने से लेकर उनके दोष और पाप को दूर करते हुए मोक्ष दिलाने का भी काम किया. हिंदू धर्म में भगवान राम के रूप में पूजे जाने वाले राम को भले ही दूसरे धर्म में ईश्वर के रूप में न स्वीकारा जाता हो लेकिन दुनिया उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम यानि सभी पुरुषों में उत्तम और मर्यादा की मूर्ति के रूप में जाने वाले महानायक के रूप में जरूर स्वीकार करती है. यही कारण कि हर धर्म से जुड़े लोगों की इच्छा होती है कि उनके घर में राम जैसा आज्ञाकारी और गुणी पुत्र हो.

कब हुई भगवान राम की मृत्यु

मानव जीवन का सच है कि जिस किसी ने भी पृथ्वी पर जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है. मृत्यु एक ऐसा सत्य है, जिसका साक्षात्कार हर किसी को कभी न कभी करना ही पड़ता है. यही कारण है कि पृथ्वी पर जितने भी लोगाें ने जन्म लिया उसे एक न एक दिन जरूर जाना पड़ा फिर चाहे वो आदमी, जीव या फिर देवता ही क्यों न रहा हो. भगवान राम की पत्नी यानि माता सीता के बारे में सभी को पता है कि धरती के फटने के बाद वो उसमें समा गईं थीं, लेकिन भगवान राम की मृत्यु कब हुई थी, इस सवाल को पूछे जाने पर स्वामी सत्येंद्र दास जी कहते हैं कि भगवान राम के स्वर्गलोक गमन के कारण और तरीके का वर्णन तो बाल्मीकि रामायण में मिलता है, लेकिन वे किसी तिथि को गये यह ज्ञात किसी को ज्ञात नहीं है.

कैसे हुआ भगवान राम का स्वर्गलोक गमन

रामलला के पुजारी स्वामी सत्येंद्र दास जी संस्कृत के इस श्लोक का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ‘दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च, रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति..’ अर्थात् 11 हजार वर्ष तक पृथ्वी पर जब राजा राम अपना राज कर चुके थे तो एक दिन काल उनके पास आकर संकेत करता है कि आपका समय हो चुका है, इसलिए आप अब चलें. इसके बाद वे अयोध्या के गुप्तार घाट पर जाते हैं और जैसे ही वे सरयू नदी में प्रवेश करते हैं तो उसी समय भगवान राम दो भुज से भगवान श्री विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप में परिवर्तित हो जाते हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार उसी समय ब्रह्मा जी विमान लेकर आते हैं और भगवान श्री विष्णु उस पर बैठकर अपने परम धाम को चले जाते हैं.

क्या कहती है कथा

हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान राम ने सरयू नदी में जल समाधि के जरिए बैकुंठ धाम गए। मान्यता है कि जब माता सीता के पृथ्वी पर समा जाने के बाद उनके पास काल साधु वेष में मिलने के लिए आया तो उन्होंने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को द्वार पर किसी को आज्ञन न आने की आज्ञा दी और यदि किसी ने इस आज्ञा का उल्लंघन हुआ तो उसे मृत्यु दंड मिलेगा। इसके कुछ ही देर बाद वहां पर दुर्वाषा ऋषि आ गये और भगवान राम से मिलने को कहा। भगवान लक्ष्मण को पता था कि वे जल्द ही क्रोधित होकर श्राप दे देते हैं, ऐसे में उन्होंने उन्हें भगवान राम के पास जाने दिया। इसके बाद भगवान राम ने लक्ष्मण को मृत्यु दंड देने की बजाय देश निकाला दे दिया, लेकिन लक्ष्मण अपने भाई की इस निराशा को जानते हुए खुद ही सरयू में विलीन हो गए। इसके बाद भगवान राम ने भी सरयू में जाकर अपना मानव स्वरूप त्याग दिया।

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(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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