Rambha Tritiya Vrat Katha : रंभा तीज के दिन पूजा के दौरान पढ़ें ये कथा, जानें इस व्रत का महत्व
ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रंभा तृतीया या रंभा तीज के नाम से जाना जाता है. ये दिन अप्सरा रंभा को समर्पित है. अप्सरा रंभा को उन 14 रत्नों में से एक माना जाता है, जो समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुए थे. रंभा स्त्री के सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करती हैं. माना जाता है कि रंभा तीज (Rambha Teej) के दिन अप्सरा रंभा की पूजा करने से सुंदर रूप प्राप्त होता है. इस दिन अगर कुंवारी कन्याएं पूजा करें तो उन्हें मनभावन पति प्राप्त होता है, वहीं सुहागिन महिलाओं को रंभा तीज के दिन देवी रंभा की पूजा करने से अखंड सौभाग्य मिलता है. इस बार रंभा तीज 2 जून को गुरुवार के दिन पड़ रही है. इस दिन देवी रंभा की पूजा करते समय उनकी ये कथा जरूर पढ़ें.
रंभा तृतीया व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार पृथ्वी के निर्माण के लिए एक बार ब्रह्मा जी नारायण से बात कर रहे थे, भगवान विष्णु भी पृथ्वी के निर्माण के बारे में विचार करने लगे. इस बीच माता लक्ष्मी नारायण से नाराज हो गईं और क्षीर सागर की गहराइयों में समा गईं. लक्ष्मी के लुप्त होने से सभी देवता और दानव श्री हीन हो गए. हर तरह त्राहिमाम त्राहिमाम होने लगा. संसार के सुचारू रूप से संचालन के लिए लक्ष्मी का होना बहुत जरूरी है. वही सृष्टि के निर्माण के लिए बहुत सी चीजों की जरूरत थी. ऐसी तमाम चीजें क्षीर सागर में छिपी थीं.
भगवान विष्णु ने तय किया कि वे देवताओं और दानवों के बीच समुद्र का मंथन कराएंगे. लेकिन इसके लिए देवता और दानव, कोई भी तैयार नहीं था. तब नारायण ने उन सभी को समुद्र मंथन से अमृत का लालच दिया और समुद्र मंथन करने के लिए कहा. अमृत के लालच में सभी देवताओं और दानवों ने मिलकर मंदार पर्वत की सहायता से समुद्र मंथन किया. इस बीच समुद्र से 14 रत्न निकले. इसमें से एक अप्सरा रंभा भी थीं. सबसे आखिर में माता लक्ष्मी समुद्र से बाहर आयीं. कहा जाता है कि ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को अप्सरा रंभा अवतरित हुईं थीं. वे बेहद खूबसूरत थीं. तब से इस दिन को रंभा तीज के नाम से जाना जाने लगा और इस दिन अप्सरा रंभा की पूजा की जाने लगी.
रंभा तीज का महत्व
रंभा तीज की पूजा और व्रत सुहागिन महिलाओं और कन्याओं के लिए काफी अच्छा माना गया है. इस दिन देवी रंभा का व्रत व पूजन करने से विवाहित महिलाओं को सौभाग्य, आरोग्य और सौंदर्य की प्राप्ति होती है. वहीं कुंवारी कन्याओं का यौवन लंबे समय तक बना रहता है. साथ ही उनको सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है.
