Sawan 2023: शत्रुओं पर विजय दिलाते हैं श्री नीलकंठेश्वर भगवान, 84 महादेव में है 54वां स्थान

उज्जैन के पिपलीनाका क्षेत्र में एक ऐसा चमत्कारी और दिव्य शिव मंदिर है, जो कि 84 महादेव में 54वां स्थान रखता है. यहां भगवान का अत्यंत चमत्कारी शिवलिंग होने के साथ ही गर्भग्रह में माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की अष्टधातु की प्रतिमाएं विराजित हैं. साथ ही द्वार पर नंदी की प्रतिमा भी आकर्षक है. मंदिर के पुजारी वेदाचार्य पंडित सपन व्यास ने जानकारी देते हुए बताया कि मंदिर में विराजित श्री नीलकंठेश्वर महादेव के दर्शन करने मात्र से ही मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं. मंदिर में प्रदोष एवं सोमवार को पूजन करने का विशेष महत्व है.

मंदिर के पुजारी वेदाचार्य पंडित संपन्न व्यास ने बताया कि वैसे तो वर्षभर श्री नीलकंठेश्वर का पूजन-अर्चन करने के साथ ही मंदिर में हर त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन श्री नीलकंठेश्वर के प्रिय मास श्रावण में प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में 11 ब्राह्मण भगवान नीलकंठेश्वर का अभिषेक पूजन कर रुद्राभिषेक करते हैं. मंदिर में ब्रह्म मुहूर्त में होने वाले इस रुद्राभिषेक के साथ ही ढोल नगाड़ों से होने वाली दिव्य आरती में बड़ी संख्या में भक्तजन शामिल होते हैं.

12 वर्षों तक किया गया था अखंड रामायण पाठ

बताया जाता है कि श्री नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर पर वर्ष 2004 से वर्ष 2016 तक अखंड रामायण पाठ का आयोजन हुआ था. 12 वर्षों तक चले अखंड रामायण पाठ के बाद मंदिर में प्रत्येक माह की 9 तारीख को अखंड रामायण पाठ किया जाता है.

यह है श्री नीलकंठेश्वर की पौराणिक कथा

नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर को लेकर एक कथा है, जिसमें महादेव देवी पार्वती को आद्यकल्प के राजा सत्यविक्रम की कथा सुनाते हैं, जो कि शत्रु से हारकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में शरण लेने पहुंचे थे. महर्षि ने उन्हें महाकालवन निश्चित एक शिवलिंग के दर्शन करने को कहा था. जब राजा सत्य विक्रम इस शिवलिंग का पूजन-अर्चन करने पहुंचे तो यहां महर्षि के कथनानुसार एक तपस्वी दिखाई दिया, जो कि सूर्य की तरह तेजस्वी थे.

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उस परम तापस ने सब जानकर एक हुंकार भरी, जिससे पांच कन्याएं प्रकट हुईं, जिनमें एक सिंहासन पर आसीन थी और चार उसे उठाकर लाई थीं. तपस्वी ने एक और हुंकार भरी, जिससे कुछ अप्सराएं प्रकट होकर नृत्य करने लगीं. यह देख राजा आश्चर्यचकित हो गए. तपस्वी ने उन्हें शत्रुओं पर विजय और सभी सुखोपभोग हेतु शिवराधना करने का कहा. राजा ने भक्तिपूर्वक ऐसा ही किया और उन्हें शिव का सान्निध्य प्राप्त हुआ.

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राजा को शिवलिंग के दर्शन से निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ. राजा तब अपने राज्य लौट गए, जहां उन्हें चक्रवर्तित्व लाभ किया. तब से यह लिंग नीलकंठेश्वर के नाम से विख्यात हो गया. बताया जाता है कि गृही, संन्यासी और ब्रह्मचारी जो भी इस शिवलिंग के दर्शन करेगा, उसके सहस्र जन्मकुल पूर्व संचित पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे सिद्धि प्राप्त होगी. उसका दान, तप, होम, जप, ध्यान और अध्ययन अक्षय हो जाता है.

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