Sheetala Ashtami 2023: शीतला अष्टमी को क्यों कहते हैं बसौड़ा, जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Sheetala Ashtami 2023: सनातन परंपरा में चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि सभी दु:खों को दूर करके सुख, सौभाग्य और आरोग्य प्रदान करने वाली माता शीलता की पूजा, जप एवं व्रत के लिए समर्पित है. हिंदू धर्म में इसे बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है. होली के बाद ठीक आठवें दिन पड़ने वाले इस पावन पर्व पर माता शीतला को बासी भोग लगाने की परंपरा है. शीतला अष्टमी के दिन आखिर देवी को क्यों बासी भोग लगाया जाता है और क्या इस व्रत की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त, आइए विस्तार से जानते हैं.

पंचांग के अनुसार इस साल देश की राजधानी दिल्ली स्थित समय के मुताबिक चैत्र मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि 14 मार्च 2023 को रात्रि 08:22 बजे से प्रारंभ होकर 15 मार्च 2023 को सायंकाल 06:45 बजे तक रहेगी. इस दिन सभी दु:खों को हरने वाली माता शीतला की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त प्रात:काल 06:31 से 06:29 बजे तक रहेगा. शीतला अष्टमी के दिन बसौड़ा की पूजा प्रात:काल 06:31 से लेकर सायंकाल 06:29 के बीच कभी भी की जा सकेगी.

क्यों लगाया जाता है माता को बासी भोग

लोक मान्यता है कि एक बार एक गांव के लोगों ने देवी शीतला की पूजा करते हुए उन्हें गरमा-गरम भोग लगाया, जिससे खाने के बाद माता का मुंह जल गया. इससे माता क्रोधित हुईं और अगले दिन उस गांव में आग लग गई, जिसमे सभी घर जल गए लेकिन एक बजुर्ग महिला की झोपड़ी बची रह गई. लोगों ने जब उस बुजुर्ग महिला से इसके पीछे का कारण जानना चाहा तो उसने बताया कि उसके पास माता को ताजा भोग लगाने को कुछ भी नहीं था, इसलिए उसने उन्हें बासी भोजन कराया, जिससे प्रसन्न होकर उस पर उन्होंने ये कृपा बरसाई.

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बसौड़ा की पूजा के नियम

चूंकि माता शीतला को शीतल चीजें बहुत प्रिय हैं और उस दिन बुजुर्ग महिला द्वारा बासी भोग लगाने पर उस पर माता की कृपा बरसी इसलिए आज तक माता को बासी भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है और शीतला अष्टमी पर्व के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है.

शीतला अष्टमी पूजा विधि

शीतला अष्टमी के व्रत वाले दिन साधक को सूर्योदय से पहले उठकर ठंडे या फिर सामानय पानी से स्नान करना चाहिए. तन और मन से पवित्र होने के बाद इस व्रत को विधि-विधान से करने का संकल्प लें और उसके बाद माता के मंदिर में जाकर या फिर अपने घर में उनका विधि-विधान से पूजन करें. माता के इस व्रत में भोग लगाने के लिए व्रत के एक दिन पहले रात को ही भोग बना लें. माता के इस व्रत में उन्हें दाल-भात, मिठाई, पुआ, फल आदि का भोग लगाया जाता है. माता की पूजा में उनकी कृपा पाने के लिए विशेष रूप से शीतला स्तोत्र का पाठ या फिर शीतला अष्टमी की कथा का पाठ करें या सुनें. पूजा के अंत में माता की आरती करने के बाद उनसे अपनी गलतियों की माफी और सुख-सौभाग्य और आरोग्य का आशीर्वाद मांगे.

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(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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