तिल दिलाएंगे षटतिला एकादशी पर भगवान विष्णु का आशीर्वाद, होगी स्वर्गलोक की प्राप्ति!

हिंदू धर्म में हर महीने आने वाली एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। इसी क्रम में, साल में आने वाली सभी एकादशियां बहुत शुभ होती हैं और इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। लेकिन, इन सब 24 एकादशियों में से षटतिला एकादशी को बेहद शुभ माना जाता है। एस्ट्रोसेज का यह ब्लॉग आपको षटतिला एकादशी के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्रदान करेंगे। साथ ही, इस एकादशी का पूजा मुहूर्त, महत्व, सही पूजा विधि, पौराणिक कथा के साथ-साथ षटतिला एकादशी पर किए जाने वाले सरल एवं अचूक उपायों से भी हम आपको अवगत कराएंगे। तो आइए  बिना देर किये शुरुआत करते हैं इस ब्लॉग की। 

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हम सभी जानते हैं कि सनातन धर्म में व्रत एवं उपवास को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि व्रतों के द्वारा भगवान की कृपा प्राप्त की जा सकती है और इसी क्रम में, व्रत जब एकादशी तिथि को किया जाता है, तो इसके महत्व में कई गुना वृद्धि हो जाती है। वैसे तो, साल में कुल 24 एकादशी तिथि आती है, लेकिन अधिकमास होने पर इनकी संख्या 24 से बढ़कर 26 हो जाती है। माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी को षट-तिल-एकादशी या तिला एकादशी भी कहा जाता है क्योंकि षटतिला एकादशी में तिल का उपयोग शुभ माना जाता है। 

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षटतिला एकादशी 2024: तिथि व समय

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल षटतिला एकादशी माघ माह के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को आती है। वर्ष 2024 में षटतिला एकादशी 06 फरवरी 2024, मंगलवार को पड़ेगी। एकादशी तिथि की शुरुआत 05 फरवरी 2024 की शाम 05 बजकर 27 मिनट पर होगी और इसकी समाप्ति अगले दिन 06 फरवरी 2024 की शाम 04 बजकर 10 मिनट पर हो जाएगी। उदया तिथि के अनुसार, षटतिला एकादशी का व्रत 06 फरवरी 2024 को ही किया जाएगा।

षटतिला एकादशी 2024 व्रत मुहूर्त

षटतिला एकादशी पारण मुहूर्त: 07 फरवरी 2024 की सुबह 07 बजकर 06 मिनट से 09 बजकर 17 मिनट तक 

अवधि: 02 घंटे 11 मिनट

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षटतिला एकादशी का महत्व

अगर हम षटतिला एकादशी के अर्थ की बात करें, तो इस एकादशी को तिल से जोड़ा गया है और इसके अंतर्गत छह तरह के तिलों का उपयोग किया जाता है। इस वजह से ही इसे षटतिला एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि हिंदू कैलेंडर में माघ का महीना भगवान श्रीहरि विष्णु को अति प्रिय होता है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को षटतिला एकादशी के रूप में जाना जाता है। जो भक्त षटतिला एकादशी व्रत को पूरी आस्था एवं श्रद्धा के साथ रखते हैं, उन्हें अपने जीवन में धन-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन सच्चे मन से विष्णु जी की उपासना करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। 

मान्यता है कि षटतिला एकादशी व्रत से कन्यादान के समान ही फल की प्राप्ति होती है। सामान्य शब्दों में कहें तो, मनुष्य को जितना पुण्य कन्यादान, स्वर्ण दान और हजारों वर्षों तक तप करने से मिलता है, उतने ही पुण्य की प्राप्ति षटतिला एकादशी व्रत करने मात्र से हो जाती है। साथ ही. घर-परिवार में भी सुख-शांति बनी रहती है। जातक धरती पर सभी तरह के सुखों का आनंद लेता है और मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त होता है।

मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी पर भक्त जगत के पालनहार भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी पूजा-अर्चना विधि पूर्वक करते हैं। यह एकादशी भक्तों का पाप नष्ट करने का भी सामर्थ्य रखती है इसलिए इस दिन मनुष्य के पापों को नष्ट करने वाला पापहरणी व्रत षटतिला एकादशी व्रत के अनुरूप ही रखा जाता है। भक्तजन इस व्रत को बहुत ही आस्था और श्रद्धा के साथ रखते हैं।

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षटतिला एकादशी में तिल का महत्व          

षटतिला एकादशी के दिन तिल का उपयोग करना बहुत शुभ माना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि श्रीहरि विष्णु के पसीने से तिल की उत्पत्ति हुई है इसलिए इस एकादशी के दिन तिल का उपयोग धन, समृद्धि और वैभव की प्राप्ति के लिए किया जाता है। षटतिला एकादशी पर तिल का दान, तिल का स्नान, तर्पण आदि कार्य करने की परंपरा है और इन कार्यों को करना आपके लिए फलदायी साबित होता है। षटतिला एकादशी पर तिल का इस्तेमाल 6 तरीकों से किया जाता है जो कि इस प्रकार हैं:

तिल से स्नान करें,तिल का उबटन लगाएं, तिल मिला हुआ जल पिएं, तिल का हवन करें, तिल का तर्पण करें, तिल का भोजन करें  

तिल से जुड़ी ऐसी मान्यता है कि षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान करने से व्यक्ति को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।

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कैसे करें षटतिला एकादशी व्रत?

यदि आप षटतिला एकादशी का व्रत करने के बारे में सोच रहे हैं, तो इस व्रत को रखने के दो तरीके हैं, पहला निर्जला व्रत और दूसरा फलाहारी व्रत। जिन भक्तों का स्वास्थ्य उत्तम है, वह निर्जला व्रत रख सकते हैं, परंतु अगर आप निर्जला व्रत रखने में असमर्थ हैं, तो आप फलाहारी व्रत भी कर सकते हैं जिसे जलीय व्रत भी कहा जाता है।

षटतिला एकादशी व्रत की पूजा विधि

एकादशी व्रत के नियमों की शुरुआत दशमी तिथि से हो जाती है। दशमी तिथि पर सूर्यास्‍त के बाद भोजन का सेवन न करें और रात को सोने से पूर्व विष्णु जी का ध्‍यान अवश्य करें। षटतिला एकादशी के दिन भक्त को प्रातः काल उठकर नित्य कर्मों से निवृत होने के बाद जल में तिल डालकर स्नान करना चाहिए। इसके पश्चात, भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करें। साथ ही, जगत पालनहार विष्णु जी की तस्वीर या प्रतिमा को चौकी पर स्थापित करें। अब इन मूर्तियों पर गंगाजल में तिल मिलाकर छिड़काव करें और साथ ही, पंचामृत से इनका स्नान करें। हालांकि, पंचामृत में भी तिल के बीज जरूर मिलाएं। अब भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने देसी घी का दीपक जलाएं तथा फूल अर्पित करें। इसके उपरांत, धूप और दीप से विष्णु जी की आरती करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। षटतिला एकादशी व्रत का पूजन करने के बाद भगवान को प्रसाद के रूप में तिल का भोग जरूर लगाएं। 

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षटतिला एकादशी की पौराणिक कथा

धर्मग्रंथों में षटतिला एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है: एक बार नारद मुनि भगवान विष्णु के धाम बैकुण्ठ गए और वहां जाकर उन्होंने विष्णु जी से षटतिला एकादशी व्रत के महत्व के बारे में पूछा। नारद जी द्वारा आग्रह किये जाने पर भगवान विष्णु ने बताया कि, प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मण की पत्नी रहती थी और उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी। वह मेरी भक्त थी और सच्चे हृदय से मेरी पूजा-अर्चना किया करती थी। इस प्रकार, उसने मुझे प्रसन्न करने के लिए एक बार एक महीने तक व्रत किया और मेरी विधि पूर्वक आराधना की। इस व्रत के प्रभाव से उसका शरीर शुद्ध हो गया, लेकिन कभी भी वह ब्राह्मण और देवताओं के लिए अन्न दान नहीं किया करती थी। यह जानकर मेरे मन में विचार आया कि यह स्त्री जो मेरी अनन्य भक्त है वह बैकुंठ में निवास करते हुए भी सदा अतृप्त रहेगी। अत: एक दिन मैं स्वयं उसके पास भिक्षा मांगने के लिए गया।

जब भिक्षुक के रूप में मैंने उससे भिक्षा मांगी, तब उस स्त्री ने एक मिट्टी का पिंड उठाया और मेरे हाथों पर रख दिया। मैं उस पिंड को लेकर बैकुंठ वापिस आ गया और इसके कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई तथा उससे मेरे धाम में स्थान प्राप्त हुआ। यहाँ उस स्त्री को एक कुटिया और आम का पेड़ मिला। वह खाली कुटिया को देखकर घबराते हुए मेरे पास आई और कहा, मैं तो हमेशा से धर्म का पालन करने वाली रही हूं, फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली प्रभु? उस समय मैंने बताया कि आपने कभी अन्नदान नहीं किया तथा भिक्षा में मुझे मिट्टी का पिंड देने की वजह से ऐसा हुआ है। भगवान विष्णु ने आगे कहा कि जब देव कन्याएं आपसे मिलने के लिए आपकी कुटिया में आए, तो आप तब तक द्वार न खोलना जब तक वह आपको षटतिला एकादशी व्रत का विधान न बता दें।

स्त्री ने विष्णु जी के कहे अनुसार ही किया और उसने देवकन्या द्वारा बताई गई विधि से ही षटतिला एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से स्त्री की कुटिया अन्न और धन-धान्य से भर गई। आगे भगवान विष्णु कहते हैं कि हे नारद, जो मनुष्य सच्चे मन से षटतिला एकादशी का व्रत रखता है और तिल का दान करता है उसे अपने जीवन में मोक्ष और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

षटतिला एकादशी के दिन क्या करें क्या न करें?

इस व्रत में फलाहार और भोजन में तिल का सेवन करें। विष्णु जी की पूजा तिल से करें और प्रसाद के रूप में तिल का भोग लगाएं। षटतिला एकादशी के दिन तिल को पैर में आने से बचाएं।इस व्रत में अन्न, नमक और तेल का सेवन वर्जित माना गया है। इस एकादशी में मसूर की दाल और शहद का सेवन न करें। 

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षटतिला एकादशी पर करें ये सरल एवं अचूक उपाय

उच्च वेतन के लिए: नौकरी में अच्छा वेतन पाने के लिए षटतिला एकादशी पर विष्णु भगवान के मंत्र ‘ॐ माधवाय नम:‘ का 21 बार जाप करें। इसके बाद, पिसे हुए तिल में शक्कर और थोड़ा घी मिलाकर विष्णु जी को भोग लगाएं तथा खुद भी इसका सेवन करें। 

जीवनसाथी के साथ मधुर संबंधों के लिए: यदि आप जीवनसाथी के साथ रिश्ते को मज़बूत बनाना चाहते हैं, तो इस एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु को पंचामृत में तिल मिलाकर भोग लगाएं और एकाक्षी नारियल भी चढ़ाएं। इस उपाय को करने से पार्टनर के साथ आपके संबंध मज़बूत होंगे।

धन-धान्य में वृद्धि के लिए: जो जातक अपने जीवन में अपार धन-धान्य प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इस एकादशी पर तिल का दान करना चाहिए और साथ ही,  विष्णु जी की आरती घी के दीपक से करनी चाहिए। ऐसा करने से निश्चित ही आपकी धन-दौलत में वृद्धि होगी।

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