प्रार्थना के लिए शब्दों से ज्यादा सच्चे मन की जरूरत होती है, पढ़ें इससे जुड़ी 5 बड़ी सीख

हिंदू धर्म में कष्टों को दूर करने और कामनाओं को पूरा करने के लिए 33 कोटि देवी-देवताओं की पूजा का विधान है. इन दिनों भी नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है, जिसके 09 दिनों में देवी दुर्गा के 09 स्वरूपों की साधना-आराधना और प्रार्थना करते हैं. कुछ ऐसे ही सभी धर्मों में परम शक्ति की प्रार्थना-आराधना का विधान है. मान्यता है कि यदि सच्चे मन से कोई प्रार्थना की जाए तो वह जरूर पूरी होती है.

किसी भी धर्म में की जाने वाली प्रार्थना एक ऐसा माध्यम है, जिसके जरिए हम परम शक्ति से अपने शुभता, सफलता आदि को पाने के लिए उसका आशीर्वाद की कामना करते हैं. मान्यता है कि प्रार्थना करने पर व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह होता है. प्रार्थना से मिलने वाली शक्ति के माध्यम से वह अपने जीवन से जुड़ी चुनौतियों का आसानी से मुकाबला कर पाता है. आइए दैनिक रूप से या फिर व्रत-पर्व पर की जाने वाली प्रार्थना का महत्व जानने के लिए इससे जुड़े 5 अनमोल विचार पढ़ते हैं.

जिन लोगों की आत्मा शुद्ध नहीं होती है, वे कभी भी न तो प्रार्थना कर सकते हैं और न ही उसका पुण्यफल पा सकते हैं.
प्रार्थना किसी भी धर्म या परंपरा का निचोड़ है, जिसे सच्चे मन से करने पर व्यक्ति की कमियां और कष्ट दूर और सुख-सौभाग्य और आत्मबल में वृद्धि होती है.
सच्ची प्रार्थना वही होती है, जिसमें शब्द कम और पवित्र भाव ज्यादा होता है. आपकी प्रार्थना में जितने ज्यादा शब्द कम होंगे, आपकी प्रार्थना उतनी ही अच्छी होगी.
किसी भी परम शक्ति के लिए की जाने वाली प्रार्थना उस धर्म, परंपरा या फिर कहें आध्यात्मिकता की ओर पहला कदम होता है. प्रार्थना उस व्यक्ति को उस परमशक्ति के समीप लेकर जाती है.
प्रार्थना तब होती है जब आप अपने आराध्य से अपने दु:ख-दर्द को बयां करते हैं, वहीं ध्यान तब होता है जब हम उस परमशक्ति की तरफ से मिलने वाले संदेश को सुनने का प्रयास करते हैं.

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(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारितहैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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